रायपुर/बिलासपुर। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम और व्यक्तिगत निजता के अधिकार को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति के विवाह पंजीयन से जुड़े दस्तावेज, जन्मतिथि, पहचान पत्र या अन्य निजी जानकारी आरटीआई के माध्यम से किसी तीसरे पक्ष को उपलब्ध नहीं कराई जा सकती, जब तक कि उसके पीछे कोई व्यापक जनहित या भ्रष्टाचार उजागर करने जैसा ठोस कारण न हो।
जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने कहा कि आरटीआई अधिनियम, 2005 का उद्देश्य शासन-प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, लेकिन अधिनियम की धारा 8(1)(जे) व्यक्तिगत निजता की भी समान रूप से रक्षा करती है। विवाह पंजीयन आवेदन में नाम, पता, फोटो, जन्मतिथि और पहचान संबंधी दस्तावेज जैसी संवेदनशील जानकारी शामिल होती है, जिसे बिना उचित जनहित के सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
दो याचिकाएं खारिज
अंबिकापुर निवासी डी.के. सोनी ने सूरजपुर जिले के विशेष विवाह अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत विवाह पंजीयन आवेदनों, उनसे संबंधित दस्तावेजों, आदेश और इश्तहार की प्रमाणित प्रतियां आरटीआई के तहत मांगी थीं। जनसूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी ने आवेदक को तीसरा पक्ष बताते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया था। बाद में राज्य सूचना आयोग ने भी इस निर्णय को सही ठहराया। इसके खिलाफ दायर याचिकाओं को हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया।
सूचना आयोग को लगाई फटकार
एक अन्य मामले में याचिकाकर्ता ने शिकायत, जांच रिपोर्ट और गवाहों के बयानों की प्रतियां मांगी थीं। राज्य सूचना आयोग ने केवल अधिकारियों को समयसीमा का पालन करने और प्रशिक्षण देने की सलाह देकर अपील का निपटारा कर दिया था।
हाई कोर्ट ने इस रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्य सूचना आयोग केवल प्रक्रियात्मक टिप्पणियां करने तक सीमित नहीं रह सकता। आयोग का दायित्व यह तय करना है कि मांगी गई सूचना आरटीआई कानून के तहत दी जा सकती है या धारा 8 के अंतर्गत अपवाद की श्रेणी में आती है।
90 दिनों में नया निर्णय देने के निर्देश
हाई कोर्ट ने सूचना आयोग के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को पुनः आयोग के पास भेज दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि दोनों पक्षों को सुनने के बाद आयोग 90 दिनों के भीतर कानून के अनुरूप नया आदेश पारित करे।
फैसले का महत्व
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि आरटीआई का उपयोग किसी व्यक्ति की निजी जानकारी प्राप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने निजता के अधिकार और पारदर्शिता के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर देते हुए कहा कि केवल व्यापक जनहित साबित होने की स्थिति में ही तीसरे पक्ष की व्यक्तिगत जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है।

