आरटीआई से छूट नहीं पा सकता विशेष पुलिस प्रतिष्ठान, सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की मध्य प्रदेश सरकार की अधिसूचना

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भ्रष्टाचार जांच एजेंसी को ‘खुफिया एवं सुरक्षा संगठन’ नहीं माना जा सकता: सर्वोच्च न्यायालय

नई दिल्ली, 22 जून 2026। सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मध्य प्रदेश का विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (एसपीई) सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 के तहत “खुफिया एवं सुरक्षा संगठन” की श्रेणी में नहीं आता है। इसलिए राज्य सरकार उसे आरटीआई के दायरे से बाहर नहीं कर सकती। न्यायालय ने इस संबंध में जारी वर्ष 2011 की राज्य सरकार की अधिसूचना को कानून के विपरीत बताते हुए रद्द कर दिया।

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने कहा कि एसपीई का मुख्य कार्य भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों की जांच करना है, न कि राष्ट्रीय सुरक्षा या खुफिया गतिविधियों से जुड़े मामलों का संचालन करना। ऐसे में उसे आरटीआई अधिनियम की धारा 24(4) के तहत छूट देना उचित नहीं है।

क्या था मामला?

मामला एक नगर निरीक्षक से जुड़ा था, जिसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एसपीई द्वारा ट्रैप कार्रवाई में आरोपी बनाया गया था। अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद अधिकारी ने आरटीआई के माध्यम से स्वीकृति प्रक्रिया से संबंधित जानकारी मांगी थी।

राज्य सूचना आयोग ने धारा 8(1)(एच) का हवाला देते हुए सूचना देने से इनकार कर दिया था। हालांकि, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जांच पूरी हो जाने का उल्लेख करते हुए सूचना उपलब्ध कराने का आदेश दिया। इस आदेश को एसपीई ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

अदालत ने स्वयं जांची अधिसूचना की वैधता

सुनवाई के दौरान यह प्रश्न उठा कि क्या न्यायालय उस अधिसूचना की वैधता की जांच कर सकता है, जिसे याचिकाकर्ता ने सीधे चुनौती नहीं दी थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई अधीनस्थ कानून या अधिसूचना मूल कानून या संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है, तो संवैधानिक न्यायालय उसकी वैधता की स्वतः जांच कर सकता है।

पीठ ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना न्यायालय का दायित्व है और किसी अवैध अधिसूचना को केवल इसलिए बरकरार नहीं रखा जा सकता क्योंकि उसे अलग से चुनौती नहीं दी गई है।

‘खुफिया एवं सुरक्षा संगठन’ की परिभाषा स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने आरटीआई अधिनियम की धारा 24 और उसकी दूसरी अनुसूची का विस्तृत अध्ययन किया। न्यायालय ने कहा कि अनुसूची में शामिल संगठन जैसे इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी), रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) राष्ट्रीय सुरक्षा और खुफिया गतिविधियों से जुड़े हैं।

इसके विपरीत, एसपीई का गठन भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों की जांच के लिए किया गया है। अदालत ने कहा कि जांच के लिए सूचनाएं एकत्र करना और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित खुफिया जानकारी जुटाना दोनों अलग-अलग विषय हैं।

एसपीई केवल भ्रष्टाचार जांच एजेंसी

न्यायालय ने कहा कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1981 के तहत एसपीई लोकायुक्त के अधीन कार्य करती है और उसका कार्यक्षेत्र लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार, कदाचार और दुराचार की जांच तक सीमित है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि एसपीई को खुफिया एवं सुरक्षा संगठन माना जाए तो भविष्य में पुलिस की अन्य जांच एजेंसियां भी आरटीआई से छूट का दावा कर सकती हैं, जिससे पारदर्शिता का उद्देश्य समाप्त हो जाएगा।

2011 की अधिसूचना रद्द

सर्वोच्च न्यायालय ने 25 अगस्त 2011 की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसके माध्यम से एसपीई को आरटीआई अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया था। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करते हुए भ्रष्टाचार जांच एजेंसी को अनावश्यक रूप से छूट प्रदान की थी।

हालांकि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आर्थिक अपराधों की राज्य जांच ब्यूरो से संबंधित अधिसूचना के हिस्से पर इस मामले में कोई निर्णय नहीं दिया गया है, क्योंकि उस मुद्दे की सुनवाई इस अपील में नहीं हुई थी।

पारदर्शिता सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट

अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि हैं। आरटीआई से छूट केवल सीमित परिस्थितियों में और विशेष सुरक्षा एजेंसियों को ही दी जा सकती है। भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियों को सार्वजनिक जवाबदेही से बाहर नहीं रखा जा सकता।

निर्णय: विशेष पुलिस प्रतिष्ठान (एसपीई) की अपील खारिज, आरटीआई से छूट देने वाली अधिसूचना रद्द।

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