सूचना देना कानून का मूल उद्देश्य, हर मामले में दंड जरूरी नहीं
बिलासपुर, 23 जून 2026। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि आरटीआई के तहत जानकारी देने में देरी होने पर लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगाना स्वचालित या अनिवार्य नहीं है। न्यायालय ने कहा कि कानून का प्रमुख उद्देश्य आवेदक को सूचना उपलब्ध कराना है, न कि हर मामले में अधिकारियों को दंडित करना।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने महासमुंद निवासी वरिष्ठ नागरिक ललित चंद्र साहू की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। याचिकाकर्ता ने राज्य सूचना आयोग के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें संबंधित अधिकारियों पर जुर्माना लगाने से इनकार किया गया था।
उर्वरक विकास कोष से जुड़े दस्तावेज मांगे थे
मामले के अनुसार, ललित चंद्र साहू ने 12 अप्रैल 2018 को सहकारिता विभाग के तत्कालीन संयुक्त रजिस्ट्रार के समक्ष आरटीआई आवेदन प्रस्तुत किया था। उन्होंने वर्ष 2014 से 2017 के बीच उर्वरक विकास कोष के भुगतान से संबंधित दस्तावेजों की जानकारी मांगी थी।
आरोप था कि विभागीय अधिकारियों ने गलत जानकारी उपलब्ध कराई। इसके खिलाफ दायर प्रथम अपील भी खारिज कर दी गई, जिसके बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील प्रस्तुत की।
सूचना आयोग ने दिया था जानकारी उपलब्ध कराने का आदेश
राज्य सूचना आयोग ने अपील स्वीकार करते हुए संबंधित अधिकारियों को 30 दिनों के भीतर मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। हालांकि, याचिकाकर्ता आयोग के फैसले से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने अधिकारियों पर जुर्माना नहीं लगाने को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
दुर्भावनापूर्ण आचरण होने पर ही लग सकता है जुर्माना
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि समय पर सूचना उपलब्ध नहीं कराने की स्थिति में अधिकारियों पर जुर्माना लगाना अनिवार्य है। वहीं, सूचना आयोग की ओर से कहा गया कि जुर्माना तभी लगाया जाता है जब यह साबित हो कि अधिकारी ने जानबूझकर या दुर्भावनापूर्ण तरीके से सूचना रोकी है।
हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने कहा कि सूचना आयोग पहले ही संबंधित अधिकारियों को जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दे चुका था, जिससे आरटीआई कानून का मूल उद्देश्य पूरा हो गया। ऐसे में केवल देरी के आधार पर जुर्माना लगाना आवश्यक नहीं माना जा सकता।
अदालत के इस फैसले को आरटीआई अधिनियम की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि जुर्माना लगाने का निर्णय प्रत्येक मामले की परिस्थितियों और अधिकारियों की मंशा पर निर्भर करेगा।



