बिना नोटिस घर नहीं तोड़ सकती सरकार: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेदखली से पहले कानूनी प्रक्रिया अपनाने के दिए निर्देश

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बिलासपुर/राजनांदगांव, 28 जुलाई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकारी भूमि पर कथित अतिक्रमण होने की स्थिति में भी किसी व्यक्ति के घर को बिना पूर्व सूचना और कानूनी प्रक्रिया अपनाए ध्वस्त नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि प्रशासन को बेदखली या तोड़फोड़ जैसी कार्रवाई से पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है।

यह फैसला राजनांदगांव जिले के निवासी नेत्रम वर्मा की रिट याचिका पर सुनाया गया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि ग्राम पंचायत ने बिना कोई नोटिस दिए उनके आवास के एक हिस्से को गिरा दिया। उनका कहना था कि वे लगभग 30 वर्षों से वहां रह रहे हैं, भूमिहीन हैं और उन्होंने भूमि के पट्टे अथवा सरकारी आवास योजना के तहत पुनर्वास के लिए कलेक्टर के समक्ष आवेदन भी प्रस्तुत किया था, जिस पर अभी निर्णय लंबित है।

पंचायत नहीं दिखा सकी नोटिस या विध्वंस आदेश

राज्य सरकार ने अदालत में तर्क दिया कि याचिकाकर्ता सरकारी भूमि पर अनधिकृत कब्जाधारी है और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई कानून के अनुसार शुरू की गई थी। ग्राम पंचायत ने भी दावा किया कि संबंधित भूमि गोठान के लिए आरक्षित है। हालांकि, सुनवाई के दौरान पंचायत यह साबित नहीं कर सकी कि कार्रवाई से पहले कोई कारण बताओ नोटिस या विधिवत विध्वंस आदेश जारी किया गया था।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का दिया हवाला

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2025 के ऐतिहासिक निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी संरचना को हटाने से पहले संबंधित व्यक्ति को कारण बताओ नोटिस देना, सुनवाई का अवसर प्रदान करना, कारणयुक्त आदेश पारित करना तथा निर्णय को चुनौती देने के लिए पर्याप्त समय देना अनिवार्य है। ये दिशानिर्देश देशभर के सभी प्रशासनिक और स्थानीय निकायों पर समान रूप से लागू हैं।

अनुच्छेद-21 के तहत आश्रय का अधिकार भी सुरक्षित

अदालत ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद-21 केवल जीवन के अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मानपूर्वक रहने और आश्रय के अधिकार की भी रक्षा करता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल यह आरोप कि कोई व्यक्ति सरकारी भूमि पर काबिज है, प्रशासन को मनमानी कार्रवाई करने का अधिकार नहीं देता। किसी भी बेदखली या विध्वंस से पहले विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाना आवश्यक है।

कलेक्टर को 60 दिनों में आवेदन पर निर्णय का निर्देश

हाईकोर्ट ने याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए राजनांदगांव कलेक्टर को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के पट्टे अथवा पुनर्वास संबंधी आवेदन पर सुनवाई कर 60 दिनों के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए। साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि जब तक इस आवेदन पर निर्णय नहीं हो जाता, तब तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना कोई भी विध्वंस या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

फैसले का व्यापक प्रभाव

यह निर्णय छत्तीसगढ़ में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाइयों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि सरकारी भूमि पर कब्जे के मामलों में भी प्रशासन, पंचायत या अन्य स्थानीय निकाय बिना नोटिस और कानूनी प्रक्रिया के किसी व्यक्ति का घर नहीं तोड़ सकते। न्यायालय ने कानून के शासन, प्राकृतिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए प्रशासनिक जवाबदेही को भी रेखांकित किया।

प्रमुख बिंदु:

  • बिना नोटिस और सुनवाई के घर तोड़ना अवैध।
  • सरकारी भूमि पर कथित अतिक्रमण होने पर भी कानूनी प्रक्रिया अनिवार्य।
  • सुप्रीम कोर्ट के विध्वंस संबंधी दिशानिर्देशों का पालन सभी अधिकारियों के लिए बाध्यकारी।
  • कलेक्टर को 60 दिनों में पट्टे संबंधी आवेदन पर निर्णय लेने का निर्देश।
  • निर्णय तक याचिकाकर्ता के घर पर बिना विधिसम्मत प्रक्रिया कोई कार्रवाई नहीं होगी।

प्रकरण: नेत्रम वर्मा बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य (रिट याचिका क्रमांक 3371/2023)

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