12 साल पुराने सरपंच आत्महत्या मामले में आरोपी को सभी आरोपों से बरी किया
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति को उधार दी गई रकम वापस मांगना, बार-बार संपर्क करना या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में नहीं आता। न्यायालय ने इस टिप्पणी के साथ 12 वर्ष पुराने आत्महत्या मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की सात साल की सजा रद्द करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।
मामला धमतरी जिले के ग्राम बलियारा का है, जहां 17 जून 2014 को तत्कालीन सरपंच बलराम मंडावी का शव खेत में मिला था। जांच में सामने आया था कि उन्होंने कीटनाशक सेवन कर आत्महत्या की थी। घटनास्थल से मिले सुसाइड नोट में ठेकेदार अशोक कुमार वाधवानी का नाम दर्ज था।
लेनदार का पैसा मांगना वैध अधिकार
जस्टिस रजनी दुबे की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया था।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि उधार दी गई रकम की वसूली के लिए बार-बार फोन करना या संपर्क करना लेनदार का वैध अधिकार है। केवल पैसा मांगना या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी 7 साल की सजा
मृतक के परिजनों ने आरोप लगाया था कि चौपाल निर्माण कार्य के लिए सामग्री उपलब्ध कराने वाले ठेकेदार अशोक वाधवानी मूल रकम से कई गुना अधिक राशि की मांग कर रहे थे और लगातार दबाव बना रहे थे। इसी प्रताड़ना से परेशान होकर सरपंच ने आत्महत्या कर ली।
धमतरी की विशेष अदालत ने सुनवाई के बाद आरोपी को एससी-एसटी एक्ट के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण) के तहत दोषी मानते हुए सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
वहीं मृतक की पत्नी सतवती बाई और पुत्र इंद्र कुमार ने सजा बढ़ाने तथा एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग को लेकर अलग याचिका दाखिल की थी।
एससी-एसटी एक्ट के आरोप भी नहीं टिके
हाईकोर्ट ने पाया कि पूरा विवाद आर्थिक लेन-देन से जुड़ा हुआ था। गवाहों के बयान और सुसाइड नोट में ऐसा कोई तथ्य नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने मृतक को उसकी अनुसूचित जनजाति पहचान के आधार पर अपमानित या प्रताड़ित किया था। इस आधार पर एससी-एसटी एक्ट के तहत लगाए गए आरोप भी टिक नहीं सके।
आर्थिक संकट भी आत्महत्या की बड़ी वजह
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि मृतक ने ट्रैक्टर खरीदने के लिए बैंक से बड़ा ऋण लिया था। ऋण की किश्तें जमा नहीं होने पर बैंक ने ट्रैक्टर जब्त कर उसकी नीलामी कर दी थी। सुसाइड नोट में भी बैंक का 2.58 लाख रुपये बकाया होने का उल्लेख था।
हाईकोर्ट ने माना कि आर्थिक संकट, बैंक का दबाव और ट्रैक्टर की जब्ती से उत्पन्न मानसिक तनाव भी आत्महत्या का बड़ा कारण हो सकता है। इन परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध सिद्ध नहीं होता।
हाईकोर्ट का फैसला
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी अशोक कुमार वाधवानी की अपील स्वीकार करते हुए सात वर्ष की सजा रद्द कर दी और उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। साथ ही मृतक पक्ष की सजा बढ़ाने संबंधी याचिका भी खारिज कर दी।



