भिलाई ट्रिपल मर्डर केस: हाईकोर्ट ने फांसी की सजा बदली, अब आखिरी सांस तक जेल में रहेगा दोषी

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ट्रायल कोर्ट की मौत की सजा रद्द, हाईकोर्ट ने कहा- मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ नहीं

बिलासपुर/भिलाई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भिलाई के चर्चित तालपुरी ट्रिपल मर्डर केस में बड़ा फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी रवि शर्मा को ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को बदल दिया है। अदालत ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए आरोपी को बिना किसी समयपूर्व रिहाई या कानूनी छूट के आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इसका अर्थ है कि दोषी को जीवन के अंतिम समय तक जेल में रहना होगा, हालांकि संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष दया याचिका का अधिकार उसके पास सुरक्षित रहेगा।

2020 में सामने आया था दिल दहला देने वाला हत्याकांड

21 जनवरी 2020 को भिलाई के तालपुरी स्थित एक किराये के मकान में रवि शर्मा की पत्नी मंजू शर्मा, उनकी डेढ़ माह की मासूम बेटी और एन. राजू के शव बरामद हुए थे। वारदात के बाद आरोपी ने सबूत मिटाने के उद्देश्य से तीनों शवों को आग के हवाले करने का प्रयास किया था।

खुद को मृत साबित करने के लिए रची थी साजिश

जांच में सामने आया कि आरोपी ने बेहद सुनियोजित तरीके से पूरी वारदात को अंजाम दिया। उसने पहले पत्नी, मासूम बच्ची और एन. राजू को कथित रूप से नींद की दवा खिलाई, फिर उनके हाथ-पैर और मुंह चिपकने वाले टेप से बांध दिए, जिससे दम घुटने से उनकी मौत हो गई। इसके बाद उसने एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या कर स्वयं को मृत साबित करने की कोशिश की तथा घटनास्थल पर भ्रामक नोट लिखकर मामले को आत्महत्या का रूप देने का प्रयास किया।

फोरेंसिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों ने खोली साजिश

पुलिस जांच के दौरान आरोपी के पास से बरामद चिपकने वाला टेप घटनास्थल पर इस्तेमाल किए गए टेप से मेल खा गया। इसके अलावा नींद की दवा का खाली रैपर और दीवार पर लिखे नोट की हैंडराइटिंग भी आरोपी की लिखावट से मेल खाने की पुष्टि हुई। इन परिस्थितिजन्य और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने आरोपी को हत्या और सबूत मिटाने का दोषी माना।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी का अपराध अत्यंत गंभीर, सुनियोजित और विश्वासघात से जुड़ा है। उसने हत्या के बाद सबूत मिटाने और खुद को मृत साबित करने के लिए एक निर्दोष व्यक्ति की जान ली। इसके बावजूद अदालत ने माना कि यह मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए फांसी की सजा अनिवार्य नहीं है।

आजीवन कारावास रहेगा प्रभावी

हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और धारा 201 के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि सामान्य आजीवन कारावास इस अपराध के लिए पर्याप्त नहीं होगा। इसलिए आरोपी को बिना किसी समयपूर्व रिहाई या कानूनी छूट के जीवनपर्यंत कारावास भुगतना होगा।

मुख्य बिंदु

  • ट्रायल कोर्ट की फांसी की सजा हाईकोर्ट ने बदली।
  • दोषसिद्धि बरकरार, आखिरी सांस तक जेल में रहने का आदेश।
  • अदालत ने कहा- मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में नहीं।
  • हत्या, सबूत मिटाने और खुद को मृत साबित करने की सुनियोजित साजिश साबित हुई।
  • राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष दया याचिका का संवैधानिक अधिकार रहेगा।

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