बिलासपुर । छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 1992 में दर्ज एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने मामले में राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को नया शपथ पत्र (एफिडेविट) दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही याचिकाकर्ता को पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट के खिलाफ अलग से कानूनी चुनौती देने की स्वतंत्रता भी प्रदान की है।मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 15 जुलाई 2026 की तारीख निर्धारित की है।
1992 में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है मामला
यह मामला वर्ष 1992 में दर्ज एक एफआईआर से संबंधित है। याचिकाकर्ता मनोहरलाल चौधरी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पुरानी एफआईआर को निरस्त करने की मांग की थी।सुनवाई के दौरान पुलिस जांच में सामने आई कथित अनियमितताओं के आधार पर तीन डीएसपी रैंक के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए।
तीन डीएसपी पर कार्रवाई की जानकारी मांगी
इससे पहले 17 जून 2026 को हाईकोर्ट ने राज्य के डीजीपी से तीनों डीएसपी अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करने को कहा था।सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से अदालत को बताया गया कि डीजीपी ने 12 जून 2026 को राज्य सरकार को एक अनुशंसा भेजी है, जिसमें तीनों अधिकारियों के विरुद्ध लघु दंड (Minor Penalty) की सिफारिश की गई है। यह प्रस्ताव फिलहाल गृह विभाग के विचाराधीन है।
चार्जशीट दाखिल होने के बाद बदला मामला
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि जब एफआईआर निरस्त करने की याचिका दाखिल की गई थी, तब मामला विवेचना के स्तर पर था। लेकिन अब पुलिस ने जांच पूरी कर सक्षम न्यायालय में उनके विरुद्ध चार्जशीट प्रस्तुत कर दी है।इस पर याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि उन्हें कानून के तहत इस चार्जशीट को चुनौती देने की अनुमति दी जाए।
हाईकोर्ट ने दी कानूनी चुनौती की छूट
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को चार्जशीट के खिलाफ विधि अनुसार अलग से कानूनी चुनौती देने की स्वतंत्रता प्रदान की। साथ ही डीजीपी को नया शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई 2026 को निर्धारित की है।
अब इस मामले में सभी की नजरें अगली सुनवाई और राज्य सरकार द्वारा तीनों अधिकारियों के खिलाफ प्रस्तावित कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

