बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के एक लेखाकार को दी गई विभागीय सजा के मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने पाया कि समान प्रकृति के आरोपों में दोषी ठहराए गए दूसरे कर्मचारी की तुलना में याचिकाकर्ता को अधिक कठोर दंड दिया गया। न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे ने SECL को मामले पर दोबारा विचार कर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
मामला कोरबा स्थित SECL की मानिकपुर कोलियरी में पदस्थ लेखाकार सुनील शर्मा से जुड़ा है। शर्मा ने ध्रुव गार्ड प्राइवेट लिमिटेड के बिलों के भुगतान एवं निपटान में कथित अनियमितताओं को लेकर उनके खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई और दंड को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
एक जैसे आरोप, लेकिन सजा अलग
याचिका के अनुसार, सुनील शर्मा और सहकर्मी लेखाकार के.एस. ठाकुर के खिलाफ बिलों के निपटान में अनियमितताओं को लेकर विभागीय कार्रवाई की गई थी। दोनों के खिलाफ SECL के स्थायी आदेशों की धारा 26.1, 26.5 और 26.22 के तहत आरोप लगाए गए थे।
सुनील शर्मा को विभागीय जांच के बाद 4 फरवरी 2016 को एक वेतन वृद्धि संचयी प्रभाव से रोकने का दंड दिया गया। वहीं, के.एस. ठाकुर को 9 फरवरी 2016 के आदेश में एक वेतन वृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोकने की सजा दी गई थी।
शर्मा ने विभागीय स्तर पर दंड के खिलाफ अपील और पुनर्विचार का सहारा लिया, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने समानता के सिद्धांत पर दिया जोर
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विक्रम शर्मा ने तर्क दिया कि दोनों कर्मचारियों पर लगाए गए आरोप मूल रूप से समान थे। ऐसे में अलग-अलग दंड देना समानता के सिद्धांत के विपरीत है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि कर्मचारियों पर आरोप और परिस्थितियां काफी हद तक समान हों तथा उनके कदाचार की गंभीरता में कोई स्पष्ट अंतर सामने न आए, तो सामान्यतः उनके साथ दंड के मामले में समान व्यवहार किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के सिद्धांत का भी उल्लेख किया। न्यायालय ने कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई में दोषी पाए गए कर्मचारी भी भेदभावपूर्ण तरीके से अलग दंड दिए जाने की स्थिति में समान व्यवहार का दावा कर सकते हैं, बशर्ते दोनों मामलों में पर्याप्त समानता हो।
न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाएं भी बताईं
हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विभागीय मामलों में सजा तय करना सामान्यतः अनुशासनात्मक प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र में आता है। अदालत सीमित न्यायिक समीक्षा के तहत ही दंड में हस्तक्षेप करती है, विशेषकर तब जब दंड अत्यधिक या असंगत हो।
लेकिन यदि समान आरोपों वाले सह-दोषी कर्मचारी को कम सजा दी गई हो और दोनों मामलों में पर्याप्त समानता साबित हो, तो समानता के सिद्धांत के आधार पर अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
60 दिन में निर्णय लेने का निर्देश
मामले की परिस्थितियों और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि सुनील शर्मा को भी के.एस. ठाकुर के समान प्रकृति का दंड दिया जाना चाहिए था। इसलिए कोर्ट ने मामले को अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास वापस भेजते हुए दंड पर नए सिरे से उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से 60 दिनों के भीतर आवश्यक कार्रवाई पूरी करने को कहा है। इसके साथ ही सुनील शर्मा की रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया।
मामला: Sunil Sharma v. South Eastern Coalfield Limited & Others
याचिका: WPS No. 1132 of 2021
क्या है फैसले का महत्व?
यह आदेश सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि समान परिस्थितियों में कर्मचारियों के खिलाफ दंड निर्धारित करते समय मनमाना अंतर नहीं होना चाहिए। हालांकि समान आरोप का अर्थ हर मामले में अनिवार्य रूप से समान सजा नहीं है। आरोपों की गंभीरता, कर्मचारियों की भूमिका और चार्जशीट के बाद के आचरण सहित अन्य परिस्थितियों की भी जांच आवश्यक होगी।
यह फैसला विभागीय कार्रवाई का सामना कर रहे कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे समान मामले में सह-दोषी कर्मचारियों को दी गई सजा को अपने पक्ष में एक आधार के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं।


