हाईकोर्ट ने कहा- लंबित आपराधिक मामला अपने आप में अयोग्यता नहीं; पुलिस भर्ती में उम्मीदवार के चरित्र और पृष्ठभूमि का समग्र आकलन जरूरी
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पुलिस भर्ती को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सत्यापन फॉर्म में आपराधिक मामले की जानकारी देने मात्र से किसी उम्मीदवार को नियुक्ति का अधिकार नहीं मिल जाता। वहीं, किसी उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होने को भी हर स्थिति में स्वतः अयोग्यता का आधार नहीं माना जा सकता। भर्ती प्राधिकारी को उम्मीदवार के संपूर्ण आपराधिक रिकॉर्ड, आरोपों की गंभीरता और मामलों की वर्तमान स्थिति की जांच करने के बाद ही नियुक्ति के संबंध में निर्णय लेना होगा।
न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने यह फैसला नरेंद्र पाल बर्मन की याचिका पर सुनाया। याचिकाकर्ता ने अनुसूचित जाति वर्ग के तहत बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में कांस्टेबल (जीडी) पद पर नियुक्ति के लिए विचार किए जाने की मांग की थी। वह शारीरिक दक्षता परीक्षा और लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर चुका था तथा उसका नाम प्रतीक्षा सूची में पहले स्थान पर था।
सत्यापन फॉर्म में दो एफआईआर का किया था खुलासा
याचिकाकर्ता के अनुसार, भर्ती प्रक्रिया के अगले चरण में शामिल होने के लिए निर्देश दिए जाने पर उसने सत्यापन फॉर्म में अपने खिलाफ दर्ज दो आपराधिक मामलों की जानकारी दी थी। इनमें एक मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 307 सहित कई धाराओं से संबंधित था, जबकि दूसरे मामले में भी विभिन्न धाराओं के तहत आरोप दर्ज थे।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उसने आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई नहीं है। इसलिए लंबित कार्यवाही के अंतिम परिणाम के अधीन उसकी नियुक्ति पर विचार किया जाना चाहिए। उसने अपनी दलीलों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2016) के फैसले का भी हवाला दिया।
राज्य ने बताया- दो नहीं, दस मामले हैं लंबित
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कुल दस आपराधिक मामले लंबित हैं, जबकि उसने सत्यापन फॉर्म में केवल दो मामलों का उल्लेख किया था। राज्य ने यह भी दलील दी कि पुलिस बल में नियुक्ति के लिए उम्मीदवार की उपयुक्तता निर्धारित करते समय उसके संपूर्ण आपराधिक रिकॉर्ड और आरोपों की प्रकृति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इस तरह मामले में उम्मीदवार की ओर से किए गए खुलासे और उसके खिलाफ लंबित बताए गए सभी मामलों की वास्तविक स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण विवाद सामने आया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया- खुलासा नियुक्ति का अधिकार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले का सही-सही खुलासा करना महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे नियुक्ति का पूर्ण या स्वतः लागू होने वाला अधिकार पैदा नहीं होता। दूसरी ओर, केवल आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर हर उम्मीदवार को अयोग्य घोषित करना भी उचित नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस सेवा एक अनुशासित बल है, जिस पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने और जनता की सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। ऐसे में पुलिसकर्मियों से उच्च स्तर के अनुशासन, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की अपेक्षा की जाती है। इसलिए नियुक्ति प्राधिकारी को उम्मीदवार के चरित्र और पूर्ववृत्त की समग्र जांच करने का अधिकार है।
बरी होने पर भी नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मामले में बरी होने या आरोपमुक्त होने से भी पुलिस भर्ती में नियुक्ति का अधिकार स्वतः नहीं मिल जाता। सक्षम प्राधिकारी को यह देखना होगा कि आरोप किस प्रकृति के थे, कार्यवाही किस प्रकार समाप्त हुई और उम्मीदवार का समग्र आचरण एवं आपराधिक रिकॉर्ड क्या है।
60 दिनों के भीतर निर्णय लेने का निर्देश
हाईकोर्ट ने स्वयं याचिकाकर्ता की नियुक्ति की पात्रता पर अंतिम निर्णय देने के बजाय सक्षम प्राधिकारी या स्क्रीनिंग कमेटी को उसके मामले की स्वतंत्र रूप से जांच करने का निर्देश दिया। प्राधिकारी को याचिकाकर्ता की ओर से बताए गए मामलों के साथ राज्य द्वारा बताए गए अन्य मामलों की भी पुष्टि करनी होगी।
इसके बाद आरोपों की गंभीरता, मामलों की वर्तमान स्थिति, सत्यापन फॉर्म में जानकारी देने के तरीके और उम्मीदवार के चरित्र से जुड़े अन्य प्रासंगिक पहलुओं पर विचार करना होगा। याचिकाकर्ता को भी अपने पक्ष में संबंधित दस्तावेज और अन्य सामग्री प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई है।
अदालत ने सक्षम प्राधिकारी को कानून के अनुसार कारणयुक्त आदेश पारित करने का निर्देश दिया है। यह प्रक्रिया हाईकोर्ट के आदेश की प्रति प्राप्त होने से यथासंभव 60 दिनों के भीतर पूरी करने को कहा गया है।
पुलिस भर्ती के अभ्यर्थियों के लिए अहम फैसला
हाईकोर्ट के इस फैसले से पुलिस भर्ती में आपराधिक मामलों के खुलासे और उम्मीदवार की पात्रता के बीच अंतर स्पष्ट हुआ है। निर्णय का संदेश है कि न तो लंबित एफआईआर अपने आप में हर मामले में अयोग्यता है और न ही उसका खुलासा कर देना नियुक्ति की गारंटी है। उम्मीदवार की उपयुक्तता का निर्धारण उसके संपूर्ण आपराधिक रिकॉर्ड और संबंधित परिस्थितियों की जांच के बाद ही किया जाना चाहिए।
मामले में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने पैरवी की, जबकि उनकी सहायता अधिवक्ता ज़ैनब मुस्तफा वनक ने की। राज्य की ओर से सरकारी अधिवक्ता अनिल एस. पांडे उपस्थित हुए।

