बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राजनांदगांव के 37 वर्ष पुराने किराएदारी विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए किराएदार की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने मकान मालिक के पक्ष में दिए गए निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए दुकान खाली कराने का निर्देश यथावत रखा है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि मकान मालिक द्वारा व्यापार विस्तार के लिए दुकान की आवश्यकता वास्तविक, सद्भावी और न्यायोचित है। ऐसे मामलों में ट्रायल कोर्ट और अपीलीय प्राधिकरण के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
37 साल पुराना है विवाद
मामला राजनांदगांव के गुड़ाखू लाइन स्थित शिवाय कॉम्प्लेक्स की दुकान क्रमांक-09 से संबंधित है। किराएदार मोहन लाल बजाज पिछले 37 वर्षों से उक्त दुकान में होजरी व्यवसाय संचालित कर रहे थे। दुकान मालिक शिव कुमार चौरसिया और रमेश कुमार चौरसिया ने छत्तीसगढ़ भाड़ा नियंत्रण अधिनियम, 2011 के तहत दुकान खाली कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था।
मकान मालिकों का कहना था कि उनके प्लास्टिक कारोबार के विस्तार के लिए दुकान की आवश्यकता है तथा उनके पास व्यवसाय संचालन के लिए कोई अन्य उपयुक्त स्थान उपलब्ध नहीं है।
किराएदार ने रखी थी यह दलील
किराएदार की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि वर्ष 2017 में हुए समझौते के बाद पुनर्निर्माण उपरांत दुकान उन्हें पुनः आवंटित की गई थी। उन्होंने तीन लाख रुपये सुरक्षा निधि के रूप में जमा किए थे तथा नियमित रूप से बढ़ा हुआ किराया भी अदा कर रहे थे।
इसके अलावा किराएदार ने आरोप लगाया कि मकान मालिक के पास अन्य दुकानें भी उपलब्ध हैं और उन्हें अधिक किराया प्राप्त करने के उद्देश्य से बेदखली की कार्रवाई की जा रही है।
मकान मालिक की आवश्यकता को माना वास्तविक
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि मकान मालिक की व्यावसायिक आवश्यकता वास्तविक और bona fide (सद्भावी) है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किराएदार के लंबे समय से व्यवसाय संचालित करने या सुरक्षा राशि जमा करने मात्र से मकान मालिक के वैध अधिकार प्रभावित नहीं होते।
डिवीजन बेंच ने निचली अदालतों के आदेशों को सही ठहराते हुए किराएदार की याचिका खारिज कर दी और दुकान खाली कराने के आदेश को बरकरार रखा।
प्रमुख बिंदु
- राजनांदगांव की दुकान को लेकर 37 साल पुराना किराएदारी विवाद।
- हाई कोर्ट ने किराएदार की याचिका खारिज की।
- मकान मालिक की व्यापार विस्तार संबंधी आवश्यकता को माना वास्तविक।
- ट्रायल कोर्ट और अपीलीय प्राधिकरण के आदेश बरकरार।
- किराएदार द्वारा समझौता, सुरक्षा निधि और नियमित किराया भुगतान की दलीलें अस्वीकार।

