बिना कारण बताओ नोटिस 71 कर्मचारियों की पदोन्नति रद्द करना अवैध, हाईकोर्ट ने निरस्तीकरण आदेश किया रद्द

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बिलासपुर | छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुंगेली जिले के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के 71 कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए उनकी पदोन्नति निरस्त करने के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी भी सरकारी कर्मचारी की पदोन्नति बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए और सुनवाई का अवसर दिए रद्द नहीं की जा सकती। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की एकलपीठ ने ओमकार प्रसाद पांडे एवं अन्य कर्मचारियों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

क्या है मामला?

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, मुंगेली में विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की अनुशंसा के आधार पर 10 सितंबर 2024 को पदोन्नति प्रक्रिया पूरी की गई थी। इसके बाद 13 सितंबर 2024 को चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को सहायक ग्रेड-3 के पद पर पदोन्नत किया गया।

हालांकि, पदोन्नति के करीब 20 दिन बाद मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) ने 4 अक्टूबर 2024 को सभी पदोन्नतियों को निरस्त कर दिया।

शिकायत के बाद बनी जांच समिति

मामले में शिकायत की गई थी कि अंतरिम पात्रता सूची में 96 कर्मचारियों के नाम थे, जबकि अंतिम मेरिट सूची में केवल 71 नाम शामिल किए गए। 25 कर्मचारियों के नाम सूची से हट जाने पर विवाद खड़ा हो गया।

राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि शिकायतों के बाद 24 सितंबर 2024 को एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की गई थी। समिति ने पदोन्नति प्रक्रिया में अनियमितताओं की पुष्टि की, जिसके आधार पर सीएमएचओ ने पदोन्नति आदेश निरस्त कर दिया।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि पदोन्नति पूरी तरह विभागीय प्रक्रिया के तहत की गई थी। यदि प्रक्रिया में कोई प्रशासनिक त्रुटि हुई भी है, तो उसका दंड कर्मचारियों को नहीं दिया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी के सेवा अधिकारों को प्रभावित करने वाला आदेश पारित करने से पहले उसे कारण बताओ नोटिस देना और अपना पक्ष रखने का अवसर देना अनिवार्य है। बिना सुनवाई के पदोन्नति रद्द करना कानूनन उचित नहीं है।

जांच जारी रखने की अनुमति

हाईकोर्ट ने 4 अक्टूबर 2024 का पदोन्नति निरस्तीकरण आदेश रद्द करते हुए राज्य सरकार को पदोन्नति प्रक्रिया में हुई कथित गड़बड़ियों की जांच जारी रखने की अनुमति दी है। साथ ही स्पष्ट किया कि भविष्य में कोई भी कार्रवाई कानून और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए ही की जाए।

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