
दुर्ग। भूविज्ञान के क्षेत्र में छात्राओं के लिये अनेक संभावनाएं है। यदि वे निष्ठा एवं लगन के साथ अध्ययन करें तो देश, विदेश तथा प्रदेश में उनके लिये अनेक संभावनायें है, ये उद्गार पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के भूगर्भशास्त्र विभाग के सेवा निवृत्त प्राध्यापक डॉ. डी.पी. कुईती ने व्यक्त किये। डॉ. कुईती आज शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.) के भूगर्भशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित आमंत्रित व्याख्यान दे रहे थे। डॉ. कुईती ने अलग-अलग क्षेत्रों में सफल एवं प्ररिसरूद महिलाओं के विषय में पावर प्वाइंट प्रस्तुतिकरण के माध्यम से भूविज्ञान के क्षेत्र में नारी सशक्तिकरण पर रोचक व्याख्यान दिया। डॉ. कुईती के व्याख्यान के दौरान भूगर्भशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एस.डी. देशमुख, डॉ. प्रशांत श्रीवास्तव, डॉ. इन्द्रजीत साकेत तथा डॉ. राहुल द्विवेदी सहित समस्त स्नातकोत्तर छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।
अपने व्याख्यान में डॉ. कुईती ने भारत में प्रथम टीशू कल्चर लैब, पैथालॉजी लैब, अंतरिक्ष अनुसंधान, परमाणु अनुसंधान तथा भूविज्ञान के क्षेत्र में कार्य करने वाली नहिलाओं का उदाहरण देते हुए उनके सफल यात्रा पर विस्तार से चर्चा की। द्वितीय व्याख्यान में डॉ. कुईती ने हिमनदों के पिघले तथा ज्वालामुखी के उद्गार पर केन्द्रित सारगर्मित जानकारी विद्यार्थियों को दी। 77 वर्षीय डॉ. डी.पी. कुईती ने जलवायु परिवर्तन तथा ग्लोबल वार्मिंग का उल्लेख करते हुए ग्लेशियर के पिचलने के गति तथा उसके पारस्परिक परिणाम पर भी गहराई से चर्चा की। उन्होंने बताया कि प्रशांत महासागर क्षेत्र में सर्वाधिक ज्यालामुखी उद्गार देखने को मिलते है। इनमें कुछ ज्वालामुखी सक्रिय है तथा कुछ निष्क्रिय है। हाल ही में इटली के समीप ज्यालामुखी उद्गार का भी डॉ. कुईती ने उल्लेख किया। डॉ. कुईती के व्याख्यान के दौरान विद्यार्थियों ने अनेक प्रश्न पूछकर अपनी जिज्ञासा का समाधान किया।

