बिलासपुर, 23 फरवरी 2026। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने दुर्ग जिले के पैतृक कृषि भूमि विवाद में प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा पारित रिमांड (पुनर्विचार) आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी है। न्यायालय ने माना कि आवश्यक पक्षकारों को शामिल किए बिना और अतिरिक्त साक्ष्यों पर विचार किए बिना विवाद का समुचित निराकरण संभव नहीं था।
यह फैसला माननीय न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु ने एमए संख्या 20/2026 (हेमंत कुमार साहू एवं अन्य बनाम अश्वनी कुमार एवं अन्य) में 23 फरवरी 2026 को सुनाया। अपील सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 43 नियम 1(यू) के तहत जिला न्यायाधीश, पाटन द्वारा पारित रिमांड आदेश के खिलाफ दायर की गई थी।
क्या है मामला
विवाद दुर्ग जिले की पाटन तहसील के ग्राम बोहरडीह स्थित कृषि भूमि से जुड़ा है। वादियों, जो स्वर्गीय भोलाराम साहू के विधिक उत्तराधिकारी हैं, ने संपत्ति को संयुक्त पारिवारिक बताते हुए आधे हिस्से की घोषणा, विभाजन एवं स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की थी। उनका दावा था कि भोलाराम और अश्वनी कुमार सगे भाई थे तथा 1994-95 के राजस्व अभिलेखों में सह-मालिक के रूप में दर्ज थे। वर्ष 2012 में भोलाराम की मृत्यु के बाद बिना औपचारिक बंटवारे के अश्वनी कुमार ने अपने नाम राजस्व प्रविष्टियां दर्ज करा लीं और कुछ विक्रय विलेख भी निष्पादित कर दिए।
निचली अदालत ने वादियों के पक्ष में निर्णय देते हुए भूमि को पैतृक संपत्ति माना, वादियों को आधे हिस्से का हकदार ठहराया तथा कुछ विक्रय दस्तावेजों को निरस्त करते हुए स्थायी निषेधाज्ञा जारी की।
प्रथम अपील और रिमांड
प्रतिवादियों ने प्रथम अपील दायर कर आदेश XLI नियम 27 सीपीसी के तहत अतिरिक्त साक्ष्य (पूर्व निर्णयों एवं लंबित कार्यवाहियों की प्रमाणित प्रतियां) प्रस्तुत करने की अनुमति मांगी। अपीलीय न्यायालय ने आवेदन स्वीकार करते हुए मामले को गुण-दोष पर अंतिम निर्णय देने के बजाय निचली अदालत को पुनः सुनवाई हेतु वापस भेज दिया। साथ ही लक्ष्मीबाई की पुत्रियों—सुमित्राबाई और कमलाबाई—को आवश्यक पक्षकार के रूप में शामिल करने और अतिरिक्त दस्तावेजों पर सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर देने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने कहा कि आवश्यक पक्षकारों को शामिल न करना केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि नहीं, बल्कि ऐसा दोष है जिससे विवाद का प्रभावी एवं पूर्ण निपटारा बाधित होता है। धारा 99 सीपीसी के प्रावधानों का हवाला देते हुए न्यायालय ने माना कि बिना सभी आवश्यक पक्षकारों की उपस्थिति के दिया गया निर्णय टिकाऊ नहीं माना जा सकता।
अतिरिक्त साक्ष्य के संबंध में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आदेश XLI नियम 27 के तहत आवेदन स्वीकार होने के बाद, नियम 28 के अनुसार अपीलीय न्यायालय के पास यह विवेकाधिकार है कि वह स्वयं साक्ष्य ले या मामला निचली अदालत को लौटाए। यह न्यायिक विवेक का विषय है।
साथ ही, न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय जे. बालाजी सिंह बनाम दिवाकर कोल पर भरोसा करते हुए कहा कि जब अपीलीय न्यायालय पुनर्विचार आवश्यक मानता है और उसके ठोस कारण दर्ज करता है, तो उसे प्रत्येक मुद्दे पर अंतिम निष्कर्ष दर्ज करना अनिवार्य नहीं है।
निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने पाया कि प्रथम अपीलीय न्यायालय ने आदेश XLI नियम 23A, 27 एवं 28 सीपीसी के तहत अपने अधिकारों का विधिवत प्रयोग किया है और हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। परिणामस्वरूप अपील खारिज कर दी गई और रिमांड आदेश बरकरार रखा गया।
अब मामला आवश्यक पक्षकारों को शामिल कर तथा अतिरिक्त साक्ष्यों पर विचार करते हुए निचली अदालत में नए सिरे से सुना जाएगा।




