
वरिष्ठ कवियों और आलोचकों ने नवोदित रचनाकारों को कविता की भाषा, संरचना और रचना प्रक्रिया के दिए गुर
दुर्ग। शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, दुर्ग के हिंदी एवं संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्वावधान में रुसा 2.0 के अंतर्गत हिंदी दिवस के अवसर पर ‘युवा सृजन की दिशाएं’ दो दिवसीय रचना कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में अंचल के विभिन्न महाविद्यालयों में अध्ययनरत नवोदित रचनाकार विद्यार्थियों ने भाग लिया। वरिष्ठ कवियों, लेखकों, रचनाकारों एवं आलोचकों ने विद्यार्थियों से संवाद करते हुए उन्हें रचनात्मक लेखन के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी।
महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अजय कुमार सिंह ने कहा कि युवाओं के रचनात्मक विचारों को गति देने के उद्देश्य से हिंदी एवं संस्कृत विभाग द्वारा आयोजित यह कार्यशाला महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि रचनाधर्मिता एक दिन का कार्य नहीं है, बल्कि इसके लिए निरंतर मन में भावों का उद्भव और उन्हें अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया जरूरी है। उन्होंने कहा कि मातृभाषा का ज्ञान होने से अपने साहित्य को समझने में मदद मिलती है, लेकिन साहित्य की समग्रता को जानने के लिए विभिन्न भाषाओं के साहित्य को पढ़ना और समझना भी आवश्यक है।
हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. अभिनेष सुराना ने स्वागत भाषण में कार्यशाला के उद्देश्य और औचित्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कविता को केवल छंद या पंक्तियों में सजाने तक सीमित नहीं किया जा सकता। विद्यार्थियों को कविता लिखने की जल्दबाजी करने के बजाय मानवीय मूल्यों को समझना चाहिए और अपने अनुभवों को रचनाओं में स्थान देना चाहिए।
वरिष्ठ आलोचक सियाराम शर्मा ने कहा कि कविता मनुष्य को इंसान बनाने का कार्य करती है। वैज्ञानिक दौर में रोबोट अनेक कार्य कर सकता है, लेकिन उसमें मानवीय भावनाएं नहीं होतीं। कविता में वे संवेदनाएं मौजूद होती हैं, जो मानव को मनुष्य बनाती हैं। उन्होंने कहा कि अमानवीकरण के खिलाफ साहित्य मनुष्यता को बचाने का कार्य करता है। कविता व्यक्ति को पराजय के समय साहस देती है और प्रेम तथा प्रतिरोध का पाठ भी सिखाती है।
डॉ. जयप्रकाश साव ने मुक्तिबोध के उदाहरण के माध्यम से कविता की रचना प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि कविता की रचना तीन चरणों में निष्पादित होती है और कविता लेखन का कोई निश्चित सूत्र या फॉर्मूला नहीं होता। मनुष्य के अनुभव, ज्ञान और संवेदना मिलकर कविता का रूप लेते हैं। उन्होंने बताया कि इंद्रियों से प्राप्त अनुभव के साथ-साथ कल्पना भी मनुष्य के भीतर नए अनुभव और भाव पैदा करती है।
डॉ. दिव्या देशपांडे ने कहा कि मनुष्य के जीवन में कविता की भूमिका सर्वोच्च है। उन्होंने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा कि वेद भी काव्य हैं और उनमें साहित्यिक संवेदना मौजूद है।
चार समूहों में बांटकर कराया गया रचनात्मक अभ्यास
कार्यशाला के द्वितीय सत्र में वरिष्ठ कवियों एवं आलोचकों श्रीमती मीता दास, कमलेश चंद्राकर, डॉ. अंजन कुमार, डॉ. अभिषेक पटेल, श्री यशपाल जंघेल और डॉ. प्रवीण झाड़ी के मार्गदर्शन में दुर्ग जिले के आठ महाविद्यालयों से शामिल नवोदित कवियों को चार समूहों में विभाजित किया गया।
प्रत्येक समूह में नवोदित रचनाकारों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। वरिष्ठ कवियों ने रचनाओं की कमियों की ओर ध्यान दिलाते हुए कविता की भाषा, संरचना और अभिव्यक्ति को बेहतर बनाने के लिए सुझाव दिए। प्रतिभागियों को दो शब्द देकर उनके आधार पर कविता लिखने के लिए भी प्रेरित किया गया। इस अभ्यास के माध्यम से विद्यार्थियों को तत्काल रचनात्मक अभिव्यक्ति और विषय-विस्तार का अनुभव कराया गया।
कार्यशाला के बाद चारों समूहों के वरिष्ठ रचनाकारों ने अपने-अपने समूह का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। वरिष्ठ कवियों ने कहा कि कार्यशाला में शामिल नवोदित रचनाकारों में काव्य संवेदना के साथ-साथ रचनात्मक प्रतिभा भी दिखाई दी। उन्होंने प्रतिभागियों को संभावनाओं से भरा बताते हुए उनके रचनात्मक भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं।
कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन डॉ. अम्बरीश त्रिपाठी ने किया। संस्कृत विभागाध्यक्ष श्री जनेंद्र दीवान ने आभार प्रदर्शन किया। इस अवसर पर अर्थशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. के. पद्मावती, हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. रजनीश उमरे, डॉ. ओमकुमारी देवांगन, डॉ. रमणी चंद्राकर, डॉ. शारदा सिंह, डॉ. लता गोस्वामी सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

