बिलासपुर | 2 जुलाई 2026
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और शादी के वादे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यदि दो बालिग व्यक्ति लंबे समय तक अपनी आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहे हों, तो बाद में शादी नहीं होने मात्र से उसे दुष्कर्म (रेप) का मामला नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास शामिल थे, ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को सही ठहराते हुए महिला की अपील को प्रारंभिक सुनवाई (एडमिशन स्टेज) में ही खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान समय में महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं और अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने में सक्षम हैं। ऐसे मामलों में केवल शादी नहीं होने के आधार पर दुष्कर्म का अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले में संबंधों की अवधि, दोनों पक्षों के व्यवहार और परिस्थितियों का मूल्यांकन कर यह तय किया जाना चाहिए कि संबंध सहमति से बने थे या नहीं।
ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि दोनों पक्ष लंबे समय तक आपसी सहमति से रिश्ते में रहे और साथ भी रहे। ऐसे में केवल शादी से इनकार करने के आधार पर दुष्कर्म का मामला नहीं बनता। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है, इसलिए उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
मामला वर्ष 2019 का है। 40 वर्षीय महिला ने रायपुर स्थित आईआईएम में एमबीए में प्रवेश लिया था। पढ़ाई के दौरान उसकी पहचान एक सहपाठी युवक से हुई और दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं।
महिला का आरोप था कि 5 जुलाई 2019 को युवक ने ग्रुप स्टडी के बहाने अपने घर बुलाकर शादी का भरोसा देकर शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद दोनों लंबे समय तक रिलेशनशिप में रहे। महिला का कहना था कि जब भी वह शादी की बात करती, आरोपी टाल देता था। अगस्त 2021 में युवक ने बताया कि महिला के तलाकशुदा होने और अलग धर्म से होने के कारण उसके परिवार वाले इस विवाह के लिए तैयार नहीं हैं।
बाद में महिला ने महिला आयोग और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। जांच के बाद मामला ट्रायल कोर्ट पहुंचा, जहां आरोपी को बरी कर दिया गया। इस फैसले को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी खारिज कर दिया।
फैसले का महत्व
हाईकोर्ट के इस निर्णय को लिव-इन रिलेशनशिप और शादी के वादे से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टांत माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल विवाह न होने की स्थिति में स्वतः दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता, बल्कि यह देखना आवश्यक होगा कि संबंध स्वतंत्र इच्छा और आपसी सहमति से स्थापित हुए थे या नहीं।




