बिना वास्तविक खतरे या ठोस कार्रवाई के अदालत का हस्तक्षेप नहीं—नगर निगम की कथित कार्रवाई को माना अनुमान आधारित
बिलासपुर |
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रिट याचिकाओं की सुनवाई को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल आशंका या काल्पनिक आधार पर दायर याचिकाएं स्वीकार नहीं की जा सकतीं। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि रिट न्यायालय अपने असाधारण अधिकार क्षेत्र का प्रयोग तभी करता है, जब किसी व्यक्ति के अधिकारों पर वास्तविक और तात्कालिक खतरा मौजूद हो। इस मामले में अदालत ने पूर्व में जारी स्टे को निरस्त करते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
काल्पनिक आधार पर नहीं मिल सकता न्यायिक हस्तक्षेप
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि वर्तमान प्रकरण में न तो किसी प्रकार का औपचारिक नोटिस जारी किया गया है और न ही प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई की गई है। ऐसे में केवल आशंका के आधार पर न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना वास्तविक उल्लंघन के, याचिकाकर्ता को राहत नहीं दी जा सकती।
याचिकाकर्ता का दावा: बिना नोटिस दी जा रही धमकी
याचिकाकर्ता मुरारी लाल गुप्ता ने अधिवक्ता के माध्यम से दायर याचिका में दावा किया था कि वह मंगला क्षेत्र में स्थित अपनी भूमि का वैध स्वामी है और वर्षों से वहां व्यवसाय कर रहा है। उसने आरोप लगाया कि नगर निगम और जिला प्रशासन के अधिकारी बिना किसी नोटिस के उसके निर्माण को हटाने की मौखिक धमकी दे रहे हैं, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
राज्य सरकार का पक्ष: केवल आशंका, कोई कार्रवाई नहीं
राज्य सरकार और नगर निगम की ओर से प्रस्तुत पक्ष में कहा गया कि याचिका पूरी तरह से निराधार आशंका पर आधारित है। अब तक न तो किसी प्रकार की तोड़फोड़ की कार्रवाई की गई है और न ही कोई अंतिम निर्णय लिया गया है। याचिकाकर्ता अपने व्यवसाय का संचालन बिना किसी बाधा के कर रहा है।
सड़क परियोजना का जिक्र, पर नहीं हुई अधिग्रहण प्रक्रिया
मामले में वर्ष 2004 की प्रस्तावित सड़क विकास योजना का उल्लेख किया गया, जिसमें मंगला-भैंसाझार मार्ग के विकास की बात कही गई थी। हालांकि, इतने वर्षों में न तो भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई और न ही सीमांकन किया गया, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि याचिकाकर्ता की भूमि उस योजना के दायरे में आती है या नहीं।
हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब तक कोई ठोस, प्रत्यक्ष और कानूनी रूप से चुनौती देने योग्य कार्रवाई सामने नहीं आती, तब तक केवल आशंका के आधार पर दायर याचिकाएं न्यायालय में स्वीकार्य नहीं हैं। इसी आधार पर अदालत ने याचिका खारिज करते हुए पूर्व में दिया गया स्टे भी समाप्त कर दिया।*


