फर्जी अंकसूची से वार्ड बॉय की नौकरी, 7 साल बाद बर्खास्तगी; जांच में 8वीं की मार्कशीट निकली फर्जी

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बिलासपुर के सरकारी आयुर्वेदिक कॉलेज अस्पताल का मामला, नियुक्ति से पहले दस्तावेजों का सत्यापन नहीं करने पर कॉलेज प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

बिलासपुर। सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज लगाने का मामला सामने आया है। बिलासपुर स्थित गवर्नमेंट आयुर्वेदिक कॉलेज अस्पताल में वार्ड बॉय के पद पर कार्यरत महावीर साहू को फर्जी अंकसूची के आधार पर नियुक्ति लेने के मामले में करीब सात साल बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। जांच में उसकी आठवीं कक्षा की अंकसूची फर्जी पाई गई।

मामला सामने आने के बाद कॉलेज प्रबंधन ने विभागीय प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की। वहीं, इस प्रकरण ने नियुक्ति के समय अभ्यर्थी के दस्तावेजों का सत्यापन नहीं किए जाने को लेकर तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

शिकायत के बाद शुरू हुई दस्तावेजों की जांच

जानकारी के अनुसार, महावीर साहू की नियुक्ति के बाद तत्कालीन कलेक्टर अवनीश शरण को उसके प्रमाण पत्र और अंकसूची को लेकर शिकायत प्राप्त हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि नियुक्ति के दौरान नियमों के मुताबिक दस्तावेजों का सत्यापन नहीं कराया गया।

शिकायत को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर ने मामले की जांच के निर्देश दिए। इसके बाद कॉलेज प्रबंधन ने एक जांच समिति गठित की और संबंधित शैक्षणिक दस्तावेजों का सत्यापन कराया।

स्कूल से सत्यापन में फर्जी निकली मार्कशीट

जांच के दौरान महावीर साहू द्वारा नौकरी के लिए प्रस्तुत की गई वर्ष 2008 की कक्षा आठवीं की अंकसूची को संबंधित स्कूल से सत्यापित कराया गया। अंकसूची में रोल नंबर 26987 दर्ज था और स्कूल के रूप में शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला हसौद, विकासखंड जैजैपुर, जिला जांजगीर-चांपा का नाम दर्ज था।

जब विभाग ने स्कूल से अंकसूची का सत्यापन कराया तो स्कूल प्रबंधन ने इसे फर्जी बताया। इसके बाद विभागीय जांच में भी दस्तावेज संबंधी आरोपों की पुष्टि हुई।

विभागीय प्रक्रिया पूरी करने के बाद बर्खास्तगी

मामले की विभागीय जांच के दौरान वार्ड बॉय ने कथित तौर पर अपनी गलती स्वीकार कर ली। इसके बाद छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के नियम 14 के तहत निर्धारित प्रक्रिया अपनाई गई।

अपचारी कर्मचारी को एक माह का नोटिस दिया गया। निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद कॉलेज प्रबंधन ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया।

नियुक्ति के समय दस्तावेजों की जांच क्यों नहीं हुई?

मामला सामने आने के बाद कॉलेज प्रबंधन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकारी पद पर नियुक्ति के लिए शैक्षणिक दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे, तो नियुक्ति से पहले उनकी जांच क्यों नहीं कराई गई।

यदि दस्तावेजों का समय पर सत्यापन किया जाता तो फर्जी अंकसूची के आधार पर नियुक्ति मिलने की स्थिति पैदा नहीं होती। अब यह भी सवाल उठ रहा है कि नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों का सत्यापन नहीं करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी।

जांच समिति की रिपोर्ट में इस संबंध में क्या-क्या तथ्य सामने आए और तत्कालीन अधिकारियों की जिम्मेदारी किस स्तर तक तय की गई, इसे लेकर भी स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार है।

डीन ने कहा- विभागीय जांच में सामने आई सच्चाई

गवर्नमेंट आयुर्वेदिक कॉलेज के डीन डॉ. जीआर चतुर्वेदी ने कहा कि पूर्व के अधिकारियों को नियुक्ति के समय ही आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए थी। विभागीय जांच के दौरान मामले की वास्तविकता सामने आई।

उन्होंने बताया कि जांच के बाद संबंधित कर्मचारी को नोटिस दिया गया और निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। फर्जी दस्तावेज के आधार पर प्राप्त वेतन की वसूली सहित अन्य कार्रवाई के लिए राज्य सरकार को पत्राचार किया जा रहा है।

सात साल बाद हुई कार्रवाई से उठे कई सवाल

फर्जी अंकसूची के आधार पर करीब सात वर्ष तक सरकारी सेवा में रहने के बाद कर्मचारी की बर्खास्तगी ने भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेज सत्यापन की गंभीरता को फिर सामने ला दिया है। अब आगे की कार्रवाई में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि फर्जी दस्तावेज के आधार पर नौकरी पाने वाले कर्मचारी से वसूली के साथ-साथ नियुक्ति के समय लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाती है या नहीं।

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