छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मृत्यु पूर्व बयान को माना पर्याप्त साक्ष्य, आजीवन कारावास बरकरार

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बिलासपुर | 8 अप्रैल 2026

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि विश्वसनीय मृत्यु पूर्व बयान (Dying Declaration) अकेले भी दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त आधार हो सकता है। अदालत ने पत्नी की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा

यह निर्णय मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनाया।


📌 क्या है मामला?

यह घटना नवंबर 2019 में राबेली गांव की है, जहां आरोपी संतोष उर्फ गोलू श्रीवास ने अपनी पत्नी लता पर चरित्र संदेह के चलते क्रूर हमला किया।

  • आरोपी ने घर के दरवाजे बंद कर दिए
  • पत्नी पर केरोसिन डालकर आग लगा दी
  • गंभीर हालत में पीड़िता घर से निकलकर तालाब में कूदी
  • इलाज के दौरान 9 दिसंबर 2019 को सेप्टिक शॉक से मृत्यु

⚖️ कोर्ट ने क्या कहा?

अदालत ने अपने फैसले में कहा—

  • पीड़िता का मृत्यु पूर्व बयान (Dying Declaration) एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किया गया था
  • बयान से पहले डॉक्टर द्वारा उसकी मानसिक स्थिति प्रमाणित की गई थी
  • इसलिए यह बयान पूरी तरह विश्वसनीय और स्वीकार्य साक्ष्य है

अदालत ने लैटिन सिद्धांत “Nemo moriturus praesumitur mentire” (मरते समय व्यक्ति झूठ नहीं बोलता) का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे बयान न्यायिक प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।


🔬 फोरेंसिक साक्ष्य भी बने आधार

राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट में:

  • पीड़िता की जली साड़ी में केरोसिन के अंश मिले
  • आरोपी की टी-शर्ट पर भी केरोसिन के निशान पाए गए

अदालत ने कहा कि यह साक्ष्य घटना की पुष्टि करते हैं।


🚪 हत्या की मंशा स्पष्ट

कोर्ट ने यह भी माना कि:

  • घटना से पहले दरवाजा बंद करना
  • पीड़िता को बाहर निकलने से रोकना

ये सभी तथ्य हत्या के स्पष्ट इरादे (Intent to Murder) को दर्शाते हैं।


📚 केस विवरण

  • केस: CRA No. 206/2022
  • मामला: संतोष @ गोलू श्रीवास बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
  • धारा: भारतीय दंड संहिता की धारा 302

🧾

यह फैसला न्यायपालिका के उस सिद्धांत को मजबूत करता है कि:

👉 “मरते हुए व्यक्ति का बयान सत्य के सबसे करीब होता है”

और यदि वह बयान स्वेच्छा, मानसिक संतुलन और विधिक प्रक्रिया के तहत दर्ज किया गया हो, तो वह अकेले ही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त हो सकता है।


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