
बस्तर, ।
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में ऐतिहासिक धरोहरों की खोज के तहत एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। ‘ज्ञान भारतम अभियान’ के अंतर्गत करीब 500 वर्ष पुरानी दुर्लभ पांडुलिपि मिली है, जो ताड़ के पत्तों (तालपत्र) पर उकेरी गई है। यह खोज क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक और चिकित्सा परंपरा को उजागर करने वाली मानी जा रही है।
राजवैद्य परिवार के पास सुरक्षित थी पांडुलिपि
यह प्राचीन पांडुलिपि बस्तर के दास परिवार के पास सुरक्षित पाई गई। स्थानीय जानकारी के अनुसार, यह परिवार पूर्वकाल में राजदरबार से जुड़ा रहा है और उनके पूर्वज राजा के राजवैद्य के रूप में कार्य करते थे। उस समय आयुर्वेद पद्धति के माध्यम से ही उपचार किया जाता था, और यह पांडुलिपि उसी चिकित्सा परंपरा का प्रमाण मानी जा रही है।
जड़ी-बूटियों और उपचार विधियों का विस्तृत उल्लेख
पांडुलिपि में विभिन्न औषधीय जड़ी-बूटियों, उनके गुणों और उपचार प्रक्रियाओं का विस्तृत विवरण दर्ज होने की संभावना है। हालांकि यह सामग्री प्राचीन लिपि और शैली में लिखी गई है, जिसे समझना आम लोगों के लिए आसान नहीं है। इसे देखते हुए जिला प्रशासन अब विशेषज्ञों की मदद से इसका अनुवाद कराने की तैयारी कर रहा है।
ऐतिहासिक विरासत और चिकित्सा ज्ञान को मिलेगा नया आयाम
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस पांडुलिपि का सही तरीके से अध्ययन किया गया, तो यह न केवल बस्तर की ऐतिहासिक पहचान को मजबूत करेगा बल्कि आयुर्वेदिक चिकित्सा क्षेत्र में भी नई जानकारियां उपलब्ध करा सकता है। खासकर पारंपरिक जड़ी-बूटी आधारित उपचार पद्धतियों को पुनर्जीवित करने में यह महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
ज्ञान और परंपरा का अनमोल स्रोत
यह खोज इस बात का संकेत है कि बस्तर क्षेत्र केवल प्राकृतिक सौंदर्य और जनजातीय संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि ज्ञान और चिकित्सा परंपराओं का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। ‘ज्ञान भारतम अभियान’ के तहत भविष्य में ऐसी और खोजों की संभावना जताई जा रही है, जो इतिहास के कई अनछुए पहलुओं को सामने ला सकती हैं।
