मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि नाबालिग पीड़ित की आयु निर्धारण के लिए स्कूल रिकॉर्ड सबसे विश्वसनीय साक्ष्य हैं, और अस्थि-निर्माण (Bone Ossification) परीक्षण केवल अंतिम विकल्प के रूप में ही अपनाया जाना चाहिए।
मुख्य बिंदु (Key Highlights)
- स्कूल रिकॉर्ड को प्राथमिकता
न्यायालय ने कहा कि यदि स्कूल, जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो अस्थि परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती। - धारा 94 (जेजे एक्ट) का हवाला
किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 94(2) के तहत दस्तावेजों की अनुपस्थिति में ही मेडिकल परीक्षण जरूरी होता है। - पीड़िता की गवाही पर्याप्त
कोर्ट ने दोहराया कि यौन अपराध मामलों में पीड़िता की विश्वसनीय गवाही के आधार पर ही दोषसिद्धि संभव है, भले ही स्वतंत्र पुष्टि न हो। - टीआईपी (Test Identification Parade) अनिवार्य नहीं
पहचान परेड न होने पर भी कोर्ट में की गई पहचान वैध मानी जाएगी।
मामले का संक्षिप्त विवरण
30 जुलाई 2014 को सतना जिले में 14 वर्षीय नाबालिग के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ। आरोपियों अजय उर्फ शेरा और कालू उर्फ अमित कोल के खिलाफ IPC की धारा 376(D), 376(2)(i), POCSO Act की धारा 5(g), 6 और SC/ST Act के तहत मामला दर्ज हुआ।
ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए 20-20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई।
आयु निर्धारण पर कोर्ट का रुख
- स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि 15 अगस्त 2000 पाई गई
- घटना के समय पीड़िता की आयु 14 वर्ष सिद्ध हुई
- कोर्ट ने कहा:
“अस्थि परीक्षण तभी आवश्यक है जब दस्तावेज उपलब्ध न हों” - सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (Jarnail Singh vs State of Haryana, State of MP vs Anoop Singh) का हवाला देते हुए कहा गया कि:
दस्तावेजी साक्ष्य मेडिकल राय पर वरीयता रखते हैं।
सहमति का सवाल नहीं उठता
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
“यदि पीड़िता नाबालिग है, तो सहमति का कोई महत्व नहीं है”
पहचान परेड पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
- TIP (Test Identification Parade) अनिवार्य नहीं है
- कोर्ट में गवाह द्वारा की गई पहचान को ही मुख्य साक्ष्य माना गया
- सुप्रीम कोर्ट के निर्णय (Malkhan Singh Case) का हवाला
गवाही और साक्ष्य पर निष्कर्ष
- पीड़िता की गवाही सुसंगत और विश्वसनीय पाई गई
- मेडिकल और FSL रिपोर्ट से पुष्टि
- मामूली विरोधाभासों को स्वाभाविक माना गया
कोर्ट ने कहा:
“केवल पीड़िता की विश्वसनीय गवाही के आधार पर भी दोषसिद्धि संभव है”
बचाव पक्ष की दलील खारिज
- आरोपियों का अलिबी (घटना स्थल पर न होने का दावा) सिद्ध नहीं हुआ
- कोर्ट ने कहा कि ऐसी दूरी या परिस्थिति नहीं थी जिससे घटना असंभव हो
अंतिम निर्णय
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा:
“अभियोजन ने आरोपियों का अपराध संदेह से परे सिद्ध कर दिया है”
और
“निचली अदालत के फैसले में कोई अवैधता या त्रुटि नहीं है”
निष्कर्ष (Conclusion)
यह फैसला स्पष्ट करता है कि:
- आयु निर्धारण में दस्तावेजी साक्ष्य सर्वोपरि हैं
- पीड़िता की गवाही को उच्च महत्व दिया जाता है
- तकनीकी कमियों (जैसे TIP न होना) से केस कमजोर नहीं होता


