छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा- केवल निरीक्षण रिपोर्ट पर्याप्त नहीं, ठोस साक्ष्य और विद्युत अधिनियम के तहत अनिवार्य मूल्यांकन आवश्यक
रायपुर, 17 जुलाई 2026।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वर्ष 2005 के एक बिजली चोरी मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। साथ ही विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 126 के तहत अनिवार्य मूल्यांकन (Assessment) नहीं किए जाने और पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं होने के कारण निचली अदालत की दोषसिद्धि को निरस्त कर दिया गया।
न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल की एकलपीठ ने सहस राम बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (CRA No. 294/2008) में 14 जुलाई 2026 को यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने जांजगीर की विशेष अदालत द्वारा 5 मार्च 2008 को सुनाई गई दोषसिद्धि और दो वर्ष के कठोर कारावास तथा ₹5,000 के जुर्माने की सजा को रद्द कर दिया।
क्या था मामला?
अभियोजन के अनुसार 23 नवंबर 2005 को विद्युत विभाग की टीम ने आरोपी के परिसर का निरीक्षण किया था। आरोप था कि आरोपी बिजली के खंभे से सीधे अवैध कनेक्शन लेकर 10 हॉर्स पावर की चावल मिल और आटा चक्की संचालित कर रहा था। विभाग ने लगभग ₹25,000 की बिजली चोरी का दावा करते हुए विद्युत अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत मामला दर्ज कराया था।
हाईकोर्ट ने किन आधारों पर दी राहत?
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि निरीक्षण और जब्ती के दौरान मौजूद बताए गए स्वतंत्र गवाहों ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया। उन्होंने कहा कि उनसे खाली कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए थे और उनके सामने कोई जब्ती नहीं हुई थी।
अदालत ने यह भी माना कि कथित अवैध कनेक्शन में उपयोग किया गया 25 फीट लंबा बिजली का तार आरोपी से बरामद नहीं हुआ। इसके अलावा, विद्युत अधिनियम की धारा 126 के तहत कथित अवैध बिजली खपत का कोई वैधानिक मूल्यांकन भी नहीं किया गया, जबकि यह प्रक्रिया कानून के अनुसार आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने West Bengal State Electricity Distribution Company Ltd. v. Orion Metal Private Limited (2020) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि बिजली चोरी के मामलों में आपराधिक कार्रवाई के साथ-साथ धारा 126 के तहत मूल्यांकन की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है। दोनों कार्यवाहियां समानांतर रूप से चल सकती हैं और वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
अदालत की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि जब कथित तार की बरामदगी नहीं हुई और बिजली की खपत का वैधानिक मूल्यांकन भी नहीं किया गया, तब आरोपी के खिलाफ अपराध संदेह से परे सिद्ध नहीं माना जा सकता। ऐसे में केवल निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
फैसले का महत्व
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि बिजली चोरी जैसे गंभीर मामलों में भी केवल आरोप पर्याप्त नहीं हैं। अभियोजन को विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने, जब्ती की प्रक्रिया का सही पालन करने तथा विद्युत अधिनियम के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का अनुपालन करना अनिवार्य है। अदालत ने दोहराया कि आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि केवल ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही की जा सकती है।
केस: सहस राम बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
प्रकरण: CRA No. 294/2008
निर्णय तिथि: 14 जुलाई 2026

