स्वतंत्र गवाह नहीं होने पर भी पुलिस की गवाही पर्याप्त, नक्सली मामलों में हाईकोर्ट का अहम फैसला

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रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि जहां स्वतंत्र गवाह उपलब्ध कराना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं होता, वहां केवल इस आधार पर पुलिस अधिकारियों की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। यदि पुलिस की गवाही विश्वसनीय हो और दस्तावेजी साक्ष्यों से समर्थित हो, तो उसके आधार पर दोषसिद्धि बरकरार रखी जा सकती है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 30 जून को विस्फोटक पदार्थ अधिनियम से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में नक्सल आरोपियों की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि नक्सल प्रभावित संवेदनशील क्षेत्रों में स्वतंत्र गवाहों को जुटाना कई बार संभव नहीं होता, इसलिए ऐसे मामलों में पुलिस की सुसंगत और भरोसेमंद गवाही पर्याप्त मानी जाएगी।

पहले मामले में 10 साल की सजा बरकरार

बीजापुर निवासी मीनु कल्मु उर्फ कल्मुमी मनोज उर्फ डेंगा ने विशेष न्यायालय के 22 सितंबर 2025 के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। निचली अदालत ने उसे विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 के तहत 10 वर्ष के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने तथा धारा 5 के तहत 5 वर्ष के कठोर कारावास और 5 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

अभियोजन के अनुसार 14 अप्रैल 2023 को सुरक्षाबलों ने बीजापुर के फुल्लोद गांव के पास आरोपी को गिरफ्तार किया था। उसके कब्जे से इलेक्ट्रिक डेटोनेटर बरामद हुआ और उसकी निशानदेही पर खेत से 10 जिलेटिन स्टिक सहित अन्य विस्फोटक सामग्री जब्त की गई। बचाव पक्ष ने स्वतंत्र गवाह के मुकर जाने का हवाला देते हुए साक्ष्यों पर सवाल उठाए, लेकिन हाईकोर्ट ने पुलिस गवाहों की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए अपील खारिज कर दी।

तीन आरोपियों की सजा भी बरकरार

दूसरे मामले में हाईकोर्ट ने सुकमा जिले से गिरफ्तार सेमल दीपक, नारा भास्कर और तेलम मुत्ता की अपील भी खारिज कर दी। विशेष एनआईए अदालत, जगदलपुर ने 22 अप्रैल 2025 को तीनों को विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत सात वर्ष तक के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

8 मार्च 2023 को पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर बेलपोच्चा वन क्षेत्र के पास तीनों आरोपियों को मोटरसाइकिल सहित पकड़ा था। उनके पास से 45 इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेटर, 43 जिलेटिन रॉड, 49 फीट कॉर्डेक्स तार, बिजली के तार, वायरलेस बैटरी तथा नक्सली बैनर बरामद किए गए थे। जांच में सामने आया कि विस्फोटक सामग्री प्रतिबंधित नक्सली संगठन तक पहुंचाई जानी थी।

संवेदनशील इलाकों में प्रक्रिया उचित

हाईकोर्ट ने कहा कि सुरक्षा कारणों से तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के बाद आरोपियों एवं बरामद सामग्री को दस्तावेजी प्रक्रिया के लिए निकटवर्ती सीआरपीएफ शिविर ले जाना पूरी तरह उचित था। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस अधिकारियों को केवल उनके सरकारी पद के कारण अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता।

खंडपीठ ने माना कि बरामद विस्फोटकों की मात्रा, उनके संबंध में कोई वैध स्पष्टीकरण न होना तथा नक्सली संगठन तक पहुंचाने के साक्ष्य यह साबित करते हैं कि आरोपी आतंकवादी गतिविधियों को सुविधाजनक बनाने में सक्रिय रूप से शामिल थे। इसी आधार पर दोनों मामलों में दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा गया।

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