बादाम कांड: एक मुट्ठी बादाम ने खुलवाई फाइलें, दो अफसरों पर गिरी गाज

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रायपुर/बिलासपुर, 2026 | विशेष रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ में इन दिनों चर्चित “बादाम कांड” ने सरकारी कामकाज की धीमी रफ्तार और लापरवाही को उजागर कर दिया है। छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड से जुड़े इस मामले में एक युवक के अनोखे विरोध के बाद दो अधिकारियों पर कार्रवाई की गई है।


एक साल से भटक रहा था फरियादी

जानकारी के अनुसार, बिलासपुर निवासी तोरण साहू ने अभिलाषा परिसर स्थित हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में मकान खरीदा था। नामांतरण के लिए उन्होंने 17 मार्च 2025 को आवेदन किया था।

नियमों के अनुसार प्रक्रिया कुछ ही समय में पूरी होनी चाहिए थी, लेकिन एक साल बीतने के बाद भी उनका काम अटका रहा। फरियादी लगातार कार्यालय के चक्कर लगाता रहा, लेकिन हर बार “फाइल नहीं मिल रही” जैसे जवाब मिलते रहे।


विरोध का अनोखा तरीका बना चर्चा का विषय

लगातार टालमटोल से परेशान होकर 17 अप्रैल को तोरण साहू दफ्तर पहुंचे और अधिकारियों की टेबल पर बादाम फेंकते हुए कहा—
“बादाम खाने से याददाश्त तेज होती है, इसे खा लीजिए, शायद आपको मेरी फाइल याद आ जाए।”

इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और देखते ही देखते यह मामला पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया।


जांच में खुली लापरवाही की परतें

मामला जब अवनीश शरण (आयुक्त, हाउसिंग बोर्ड) के संज्ञान में आया, तो उन्होंने तत्काल जांच के आदेश दिए।

जांच में सामने आया कि—

  • आवेदन के बाद प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी
  • नवंबर 2025 में दस्तावेज भी तैयार हो गए थे
  • इसके बावजूद फाइल को करीब 5 महीने तक दबाकर रखा गया
  • आवेदक को लगातार गुमराह किया जाता रहा

दो अधिकारियों पर गिरी कार्रवाई की गाज

तथ्य सामने आने के बाद आयुक्त ने सख्त कदम उठाते हुए—

  • प्रभारी संपदा अधिकारी
  • वरिष्ठ सहायक

दोनों को उनके पद से हटाकर रायपुर मुख्यालय अटैच कर दिया।


प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल

यह पूरा मामला सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जहां प्रक्रियाएं पूरी तरह डिजिटल नहीं हैं, वहां इस तरह की लापरवाही और फाइलों का अटकना आम समस्या बन जाती है।


“बादाम कांड” सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि सिस्टम की कमजोरियों पर करारा व्यंग्य बनकर सामने आया है। इस घटना ने यह साबित कर दिया कि आम नागरिक की आवाज अगर अनोखे तरीके से उठे, तो प्रशासन को भी कार्रवाई करने पर मजबूर होना पड़ता है।


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