छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: रिटायर्ड प्रोफेसर से ग्रेच्युटी वसूली रद्द, सरकार को फटकार

Spread the love

बिलासपुर |

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने एक रिटायर्ड सहायक प्रोफेसर के खिलाफ की गई लाखों रुपये की ग्रेच्युटी वसूली को रद्द कर दिया और राज्य सरकार की कार्रवाई को “मनमानी और सनकपूर्ण” बताया।

₹6.75 लाख की ग्रेच्युटी रोकना गलत: कोर्ट

न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि रोकी गई ₹6,75,288 की ग्रेच्युटी राशि तत्काल जारी की जाए। साथ ही आदेश दिया कि यदि कोई राशि वसूली गई है तो उसे 45 दिनों के भीतर 6% वार्षिक ब्याज सहित लौटाया जाए


क्या है पूरा मामला

यह मामला महासमुंद के सरकारी महाप्रभु वल्लभाचार्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय के पूर्व सहायक प्रोफेसर सिल्वेरियस बरवा से जुड़ा है, जो 30 जून 2021 को सेवानिवृत्त हुए थे।

  • राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि उनके कार्यकाल में 12,368 पुस्तकें “लापता” हो गईं
  • इन पुस्तकों की कीमत लगभग 1.35 करोड़ रुपये बताई गई
  • इसके आधार पर ग्रेच्युटी से लाखों रुपये वसूलने की कार्रवाई शुरू की गई

कोर्ट ने क्यों रद्द किया आदेश

अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने सुनवाई में पाया कि:

  • कथित “लापता” पुस्तकें वास्तव में खोई नहीं थीं
  • वे वर्षों तक एक बंद कमरे में रखी हुई थीं
  • जनवरी 2022 में सभी पुस्तकें मिल भी गईं

इसके बावजूद सरकार द्वारा वसूली जारी रखना अदालत ने पूरी तरह अनुचित माना।


कानून का उल्लंघन: नियम 9 लागू

अदालत ने कहा कि यह कार्रवाई छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 9 का उल्लंघन है।

  • नियम के अनुसार 4 साल से अधिक पुराने मामलों में कार्रवाई नहीं की जा सकती
  • जबकि आरोप 2010-11 के थे और कार्रवाई 2022 में की गई

इस आधार पर कोर्ट ने वसूली आदेश को कानूनी रूप से अस्थिर बताया।


सरकार को लगाई फटकार*

हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि:

  • एक वरिष्ठ नागरिक को बार-बार मुकदमेबाजी में घसीटना गलत है
  • सरकार दशकों पुरानी प्रशासनिक गलतियों का बोझ पेंशनभोगियों पर नहीं डाल सकती

केस डिटेल*

  • मामला: WPS 7986/2023
  • पक्षकार: सिल्वेरियस बरवा बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
  • याचिकाकर्ता के वकील: प्रफुल्ल भरत, केशव देवांगन
  • राज्य की ओर से: दिलमन रति मिंज

यह फैसला पेंशनभोगियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक मील का पत्थर माना जा रहा है। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि सरकार बिना वैधानिक आधार के रिटायर्ड कर्मचारियों पर आर्थिक बोझ नहीं डाल सकती।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

× How can I help you?