₹30 लाख के चेक बाउंस केस में दोषसिद्धि बहाल, साझेदार की जवाबदेही पर स्पष्टता
बिलासपुर |
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने चेक बाउंस से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी की दोषसिद्धि बहाल कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि साझेदारी फर्म के मामलों में किसी साझेदार के खिलाफ कार्रवाई फर्म को पक्षकार बनाए बिना भी की जा सकती है।
क्या है पूरा मामला
यह मामला वर्ष 2014 के एक वित्तीय लेन-देन से जुड़ा है, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोपी को ₹30 लाख का अल्पकालिक ऋण दिया था। तय समय में राशि वापस न होने पर आरोपी ने जुलाई 2016 में चेक जारी किया, जो बैंक में अपर्याप्त धनराशि के कारण बाउंस हो गया।
कानूनी नोटिस के बावजूद भुगतान न होने पर शिकायतकर्ता ने परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत मामला दर्ज किया।
निचली अदालत vs अपीलीय अदालत
- निचली अदालत ने आरोपी को दोषी मानते हुए 6 महीने की सजा और ₹30 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया।
- लेकिन अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए आरोपी को बरी कर दिया कि साझेदारी फर्म को पक्षकार नहीं बनाया गया था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने अपीलीय अदालत के फैसले को पलट दिया और कहा—
- साझेदारी फर्म का अलग कानूनी अस्तित्व नहीं होता, जैसा कि कंपनी का होता है।
- फर्म केवल उसके साझेदारों का सामूहिक नाम है।
- ऐसे में किसी एक साझेदार के खिलाफ कार्रवाई वैध है, भले ही फर्म को पक्षकार न बनाया गया हो।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दायित्व “संयुक्त और अनेक” (Joint & Several Liability) होता है, इसलिए साझेदार सीधे जिम्मेदार ठहराए जा सकते हैं।
सजा में क्या बदलाव
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बहाल करते हुए सजा में संशोधन किया—
- आरोपी को 4 महीने के भीतर ₹30 लाख + 10% अतिरिक्त मुआवजा देना होगा
- भुगतान न करने पर 6 महीने की कठोर कारावास होगी
क्यों महत्वपूर्ण है फैसला
यह निर्णय चेक बाउंस मामलों में एक अहम कानूनी सिद्धांत को मजबूत करता है— 👉 सिर्फ तकनीकी आधार (जैसे फर्म को पक्षकार न बनाना) पर केस खारिज नहीं होगा, यदि साझेदार की देनदारी साबित हो जाती है।
केस संदर्भ
सीआरआर 1367/2025 – श्रीमती बिरजा जेना बनाम यशराज मेहरा

