भत्ता से बचने पत्नी को बताया ‘कामवाली’, डीएनए टेस्ट ने खोला सच; हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज

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बिलासपुर |
पत्नी को गुजारा भत्ता देने से बचने के लिए उसे ‘कामवाली’ बताने वाले पति की याचिका को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि निर्धारित भरण-पोषण राशि पूरी तरह उचित है और इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संतुलित और न्यायोचित निर्णय दिया है।

शादी से किया इनकार, पत्नी को बताया कर्मचारी
मामला रायपुर निवासी दंपती से जुड़ा है, जिनकी शादी 3 दिसंबर 2015 को हुई थी। पत्नी का आरोप था कि विवाह के कुछ समय बाद से ही उसे ससुराल में प्रताड़ित किया जाने लगा। गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल नहीं मिलने पर वह मायके लौट गई। इसके बाद उसने अपने और नाबालिग बेटे के भरण-पोषण के लिए फैमिली कोर्ट में आवेदन प्रस्तुत किया।
सुनवाई के दौरान पति ने चौंकाने वाला दावा किया। उसने शादी से ही इनकार करते हुए महिला को अपने घर में वेतन पर काम करने वाली कर्मचारी बताया। साथ ही बच्चे को अपना पुत्र मानने से भी इंकार किया। पति ने यह भी तर्क दिया कि वह बीमार है और वर्तमान में उसकी कोई आय नहीं है, इसलिए भरण-पोषण देने में असमर्थ है।

डीएनए रिपोर्ट से खुला झूठ
मामले में निर्णायक मोड़ तब आया जब अदालत के निर्देश पर डीएनए परीक्षण कराया गया। रिपोर्ट में यह स्पष्ट हो गया कि नाबालिग बच्चा उसी व्यक्ति का जैविक पुत्र है। डीएनए रिपोर्ट ने पति के दावों की पोल खोल दी और उसके झूठ का पर्दाफाश हो गया।

2016 से देनी होगी भरण-पोषण राशि
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए पति को पत्नी को ₹5,500 और बेटे को ₹2,500 प्रतिमाह भरण-पोषण राशि देने का निर्देश यथावत रखा। यह राशि आवेदन की तारीख 30 अगस्त 2016 से देय होगी।
अदालत ने यह भी माना कि पत्नी के पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है और वह प्रताड़ना के कारण अलग रहने को मजबूर हुई थी। ऐसे में उसे और बच्चे को भरण-पोषण मिलना न्यायसंगत है।
इस फैसले को पारिवारिक मामलों में तथ्यात्मक साक्ष्यों, विशेषकर वैज्ञानिक प्रमाणों की अहमियत को रेखांकित करने वाला माना जा रहा है।

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