| बिलासपुर
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पारिवारिक कानून और उत्तराधिकार से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि पहली पत्नी के जीवित रहते केवल ‘चूड़ी प्रथा’ के आधार पर की गई दूसरी शादी को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। ऐसे संबंध से जुड़ी महिला या उसकी संतान को संपत्ति में वैधानिक अधिकार नहीं मिलेगा।
न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत वैध विवाह के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है। परंपरागत रस्मों या सामाजिक मान्यता मात्र से विवाह कानूनी रूप से सिद्ध नहीं हो जाता, विशेषकर तब जब पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी की गई हो।
राजस्व रिकॉर्ड से नहीं तय होता वारिस का अधिकार
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पटवारी या अन्य राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज हो जाने से कोई व्यक्ति स्वतः कानूनी वारिस नहीं बन जाता। संपत्ति पर अधिकार का निर्धारण विधि सम्मत विवाह और वैधानिक उत्तराधिकार के आधार पर ही होगा।
निचली अदालत का फैसला बरकरार
हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 में निचली अदालत द्वारा दिए गए निर्णय को यथावत रखते हुए कहा कि संबंधित मामले में सगनूराम की संपत्ति पर अधिकार केवल पहली पत्नी से जन्मी संतान का ही होगा। दूसरी पत्नी के रूप में दावा करने वाली महिला और उसकी संतान को संपत्ति में हिस्सेदारी का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
पारिवारिक कानून में स्पष्ट संदेश
इस फैसले को पारिवारिक और उत्तराधिकार संबंधी मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है। न्यायालय ने दोहराया कि कानून से ऊपर कोई प्रथा नहीं हो सकती और वैध अधिकार पाने के लिए वैधानिक प्रावधानों का पालन अनिवार्य है।


