निजता पर प्रासंगिकता भारी: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तलाक मामले में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को दी मंजूरी

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बिलासपुर, 12 फरवरी 2026। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि वैवाहिक विवादों में साक्ष्य की स्वीकार्यता के लिए उसके संग्रह के तरीके से अधिक उसकी प्रासंगिकता (relevance) महत्वपूर्ण है। अदालत ने पारिवारिक न्यायालय द्वारा पति को मोबाइल कॉल रिकॉर्डिंग और व्हाट्सएप चैट को रिकॉर्ड पर रखने की अनुमति देने के आदेश को बरकरार रखते हुए पत्नी की रिट याचिका खारिज कर दी।

क्या है मामला
मामला हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia)(ib) के तहत दायर तलाक याचिका से जुड़ा है। पारिवारिक न्यायालय ने 12 दिसंबर 2024 को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VII नियम 14 के तहत पति के आवेदन को स्वीकार करते हुए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी थी।
पत्नी ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा कि संबंधित कॉल रिकॉर्डिंग और व्हाट्सएप चैट उसकी सहमति के बिना फोन हैक कर प्राप्त की गई हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

पति का पक्ष
पति की ओर से दलील दी गई कि प्रस्तुत इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65बी के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र संलग्न है। साथ ही यह भी कहा गया कि पारिवारिक न्यायालय ने केवल साक्ष्य को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी है, उसकी स्वीकार्यता और प्रमाणिकता का अंतिम निर्णय ट्रायल के दौरान किया जाएगा।

हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 14 और 20 का उल्लेख करते हुए कहा कि पारिवारिक न्यायालयों को साक्ष्य स्वीकार करने में व्यापक विवेकाधिकार प्राप्त है। धारा 14 के अनुसार, न्यायालय किसी भी रिपोर्ट, दस्तावेज या जानकारी को स्वीकार कर सकता है, यदि वह विवाद के समाधान में सहायक हो, भले ही वह साक्ष्य अधिनियम के तहत तकनीकी रूप से स्वीकार्य न हो।
अदालत ने कहा कि वैवाहिक विवाद स्वाभाविक रूप से निजी और संवेदनशील होते हैं, जहां साक्ष्य अक्सर व्यक्तिगत संचार और निजी आचरण से संबंधित होते हैं। ऐसे मामलों में साक्ष्य के तकनीकी नियमों का कठोर अनुपालन न्याय के उद्देश्य को विफल कर सकता है।

निजता पूर्ण नहीं: सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला
न्यायालय ने के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख करते हुए माना कि निजता मौलिक अधिकार है, लेकिन यह निरपेक्ष नहीं है। साथ ही शारदा बनाम धर्मपाल और आर.एम. मलकानी बनाम महाराष्ट्र राज्य मामलों का हवाला देते हुए कहा गया कि यदि साक्ष्य प्रासंगिक और वास्तविक है, तो वह अवैध तरीके से प्राप्त होने पर भी स्वीकार्य हो सकता है।
हालिया विभोर गर्ग बनाम नेहा मामले का संदर्भ देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 122 का उद्देश्य पति-पत्नी के बीच विवादों में गोपनीयता की रक्षा करना नहीं, बल्कि विवाह की पवित्रता बनाए रखना है।

निष्कर्ष
उच्च न्यायालय ने कहा कि वैवाहिक मुकदमों में निष्पक्ष सुनवाई और प्रासंगिक साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रारंभिक चरण में किसी पक्ष को सामग्री प्रस्तुत करने से रोकना न्याय के व्यापक उद्देश्य के प्रतिकूल होगा।
इन्हीं आधारों पर न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को उचित ठहराते हुए पत्नी की याचिका खारिज कर दी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को रिकॉर्ड पर रखने की अनुमति को बरकरार रखा।
यह निर्णय वैवाहिक विवादों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता और निजता के अधिकार के बीच संतुलन पर महत्वपूर्ण कानूनी मार्गदर्शन प्रदान करता है।

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