
कोरबा | 18 फरवरी 2026
छत्तीसगढ़ में इस वर्ष होली का पर्व केवल रंगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नई आबकारी नीति को लेकर सियासी रंग भी चढ़ गए हैं। राज्य सरकार द्वारा होली के दिन शराब दुकानों को खुला रखने के निर्णय के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया है। विपक्ष ने इसे सामाजिक संवेदनाओं से जुड़ा मुद्दा बताते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा किया है।
इस बीच कोरबा दौरे पर पहुंचे प्रदेश के आबकारी मंत्री लखनलाल देवांगन ने मीडिया से चर्चा में स्पष्ट किया कि सरकार ने आबकारी नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है। उन्होंने कहा कि जिला कलेक्टर को वर्ष में तीन दिन शराब दुकानें बंद रखने का अधिकार है। कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए यदि आवश्यक समझा जाए तो कलेक्टर अपने विवेकाधिकार का प्रयोग कर दुकानों को बंद करने का निर्णय ले सकते हैं।
निषेध दिवसों में हुआ संशोधन
नई आबकारी नीति के तहत निषेध दिवसों की सूची में संशोधन किया गया है। अब केवल 15 अगस्त, 26 जनवरी, 2 अक्टूबर और 18 दिसंबर को ही शराब दुकानें बंद रहेंगी। होली, मुहर्रम और 30 जनवरी (महात्मा गांधी की पुण्यतिथि) को निषेध दिवसों की सूची से हटा दिया गया है। इसी बदलाव के बाद प्रदेश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
मंत्री का बयान, जिम्मेदारी प्रशासन पर
मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए मंत्री देवांगन ने कहा कि होली पर दुकानें खोलने का मुद्दा सरकार की नीति का हिस्सा है, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए अंतिम निर्णय जिला प्रशासन ले सकता है। उनके इस बयान के बाद अब निर्णय की जिम्मेदारी स्थानीय कलेक्टर पर आ गई है।
सवाल बरकरार
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि कलेक्टर किस आधार पर दुकानें बंद या खुली रखने का फैसला करेंगे? यदि कोई कलेक्टर दुकानें बंद करते हैं तो क्या यह सरकार के निर्णय के विपरीत माना जाएगा? वहीं यदि दुकानें खुली रहती हैं और कोई अप्रिय घटना घटती है तो जवाबदेही किसकी होगी?
सरकार का तर्क है कि पूर्ण प्रतिबंध से अवैध शराब की बिक्री बढ़ती है और राजस्व का नुकसान होता है। नियंत्रित बिक्री व्यवस्था से पारदर्शिता बनी रहती है। हालांकि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से होली जैसे पर्व पर शराब दुकानों के खुले रहने का संदेश भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
फिलहाल होली से पहले यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति के केंद्र में है। अब सबकी निगाहें होली से ठीक पहले जिला प्रशासन के फैसले पर टिकी हुई हैं।
