📍रायपुर/नई दिल्ली |
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कहा है कि पेंशन कोई दान या इनाम नहीं, बल्कि कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है। अदालत ने लगभग तीन दशकों की देरी से सेवानिवृत्ति लाभ देने पर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश बरकरार रखा है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि प्रशासनिक देरी या अक्षमता के कारण किसी कर्मचारी या उसके परिवार को उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार ने वर्षों तक बकाया राशि अपने पास रखी, जो न्यायसंगत नहीं है। ऐसे मामलों में ब्याज देना पीड़ित पक्ष को क्षतिपूर्ति देने का उचित माध्यम है।
📌 क्या है पूरा मामला?
यह मामला जल संसाधन विभाग के एक कार्यकारी अभियंता से जुड़ा है, जिन पर वर्ष 1994 में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे थे। उन्हें निलंबित किया गया, बाद में बहाल किया गया और 1995 में वे सेवानिवृत्त हो गए।
हालांकि, विभागीय जांच लगभग 23 साल तक लंबित रही और अंततः 2019 में बंद की गई। इसके बाद भी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के चलते पेंशन और अन्य लाभ 2023 में जाकर जारी किए गए।
इस लंबी देरी से परेशान होकर मृतक कर्मचारी की विधवा और बेटे ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।
⚖️अदालत का फैसला
दिसंबर 2025 में एकल न्यायाधीश ने देरी से भुगतान पर 9% ब्याज देने का आदेश दिया था, जिसे राज्य सरकार ने चुनौती दी। लेकिन खंडपीठ ने इस आदेश को सही ठहराते हुए राज्य की अपील खारिज कर दी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही ब्याज देने का कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान न हो, फिर भी न्यायालय अपने अधिकारों के तहत न्याय, समानता और निष्पक्षता के आधार पर राहत दे सकता है।
📊 फैसले का महत्व
यह निर्णय सरकारी तंत्र की देरी के खिलाफ कड़ा संदेश देता है और यह सुनिश्चित करता है कि कर्मचारियों या उनके आश्रितों को प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा न भुगतना पड़े।
साथ ही, यह फैसला यह भी स्थापित करता है कि अदालतें जरूरत पड़ने पर उचित मुआवजे के रूप में ब्याज देने का आदेश दे सकती हैं।

