रायपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अवैध गिरफ्तारी और गैरकानूनी हिरासत के एक गंभीर मामले में अहम फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि बिना एफआईआर, बिना गिरफ्तारी के कारण बताए और बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए की गई गिरफ्तारी संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(1) का सीधा उल्लंघन है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने भिलाई निवासी होटल संचालक आकाश कुमार साहू की याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को एक लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। साथ ही, पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई और संबंधित आपराधिक प्रकरण को रद्द कर दिया गया।

ये है मामला
याचिकाकर्ता आकाश कुमार साहू, जो एक पंजीकृत और वैध होटल इवनिंग स्टार,अवंती बाई चौक, कोहका,भिलाई, का संचालन करते हैं, ने आरोप लगाया कि 8 सितंबर 2025 को स्मृति नगर पुलिस द्वारा उन्हें बिना किसी संज्ञेय अपराध की एफआईआर दर्ज किए, केवल संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के समय न तो उन्हें कारण बताए गए और न ही कानूनी औपचारिकताओं का पालन किया गया। इसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने माना कि—
- बिना एफआईआर के गिरफ्तारी।
- गिरफ्तारी के आधार/कारण न बताना।
- धारा 35(3) BNSS के तहत नोटिस ऑफ अपीयरेंस जारी न करना।
- मजिस्ट्रेट द्वारा यांत्रिक ढंग से रिमांड देना।
कानूनन अस्वीकार्य है। न्यायालय ने कहा कि निवारक गिरफ्तारी (Preventive Arrest) दंडात्मक नहीं हो सकती और इसका दुरुपयोग नागरिकों की स्वतंत्रता पर सीधा आघात है।
मुआवजे का आदेश
कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को चार सप्ताह के भीतर 1,00,000 रुपए का मुआवजा दे। यदि तय समय में भुगतान नहीं हुआ तो इस राशि पर 9% वार्षिक ब्याज देना होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार चाहे तो बाद में दोषी पुलिस अधिकारियों से यह राशि वसूल सकती है।

पुलिस व्यवस्था पर कड़ा संदेश
फैसले में कहा गया कि इस तरह की पुलिसिया कार्रवाई से आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का भरोसा कमजोर होता है। कोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया कि पुलिस कर्मियों को मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जाए और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।

