विश्व मातृभाषा दिवस पर विविध भाषाओं की गूंज से सराबोर हुआ महाविद्यालय परिसर

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दुर्ग। शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय दुर्ग के हिंदी विभाग द्वारा विश्व मातृभाषा दिवस का आयोजन किया गया। महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ.अजय कुमार सिंह ने अपना उद्बोधन अपनी मातृभाषा भोजपुरी में दिया। उन्होंने विश्व मातृभाषा दिवस पर ऐसे आयोजन की सार्थकता को रेखांकित किया। मातृभाषा का सम्मान करना है अर्थात अपनी माता का सम्मान करना है ।मातृभाषा का व्यवहार हमें अपने जड़ों से जुड़े रहने को प्रेरित करती है और अंत में उन्होंने कैलाश गौतम की भोजपुरी हास्य कविता पप्पू की दुल्हिन का पाठ किया।

हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.अभिनेष सुराना ने अपने उद्बोधन में कहा कि मातृभाषा हमारे जीवन में बहुत महत्व रखती हैं भाषा हमारी अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन है हम जिसमें बोलते और लिखते हैं वही हमारी मातृभाषा होती है । हम जितनी सहजता मातृभाषा में महसूस करते हैं उतनी अन्य भाषाओं में नहीं। वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ.जगजीत कौर सलूजा ने कहा कि हमें अपनी मातृभाषा को भूलना नहीं चाहिए बल्कि घरों में अपनी मातृभाषा का व्यवहार करते हुए अपनी संस्कृति और भाषा को बचाए रखना चाहिए। उन्होंने अपनी मातृभाषा पंजाबी में अमृता प्रीतम की कविता का सास्वर पाठ किया।
डॉ.अनुपमा कश्यप ने अपनी मातृभाषा बुंदेली में भूषण की कविता शिवा बावनी के कुछ अंश का पाठ किया। डॉ. प्रज्ञा कुलकर्णी ने कहा कि संसार में जीवन जीने की शक्ति भाषा देती है इसीलिए अपनी मातृभाषा से सदा प्रेम करना चाहिए।उन्होंने अपनी मातृभाषा मराठी में बहिणा बाई चौधरी की कविता का पाठ किया। डॉ. विजयलक्ष्मी नायडू ने अपनी मातृभाषा तेलुगु में एक भक्ति गीत सुनाया । डॉ. शकील हुसैन ने कहा कि व्यक्ति अपने आप से जिस भाषा में बात करता है ,सपना देखता है जीता है,वही उसकी मातृभाषा होती है उन्होंने अपनी मातृभाषा उर्दू को हिंदी के साथ जोड़ते हुए स्वरचित कविता का पाठ किया। डॉ. त्रिलोचन कौर ने गुरुवाणी की कुछ पंक्तियो का पाठ किया। डॉ .मीना मान कहां कि नई भाषा जानना सीखना के हमारे ज्ञान के संवर्धन के लिए बहुत आवश्यक है। डॉ.ज्योति धारकर ने कहा कि जितनी ज्यादा भाषा जानेंगे उतने ही स्वस्थ रहेंगे भाषा हम कोई भी बोले लेकिन जब हम संप्रेषण करते हैं तो संप्रेषण से उसके भाव सहज ही समझ में आ जाती हैं उन्होंने मराठी गीत प्रस्तुत किये। डॉ. देशमुख सर ने मराठी के प्रचलित तख्तियों का वीडियो दिखाते हुए अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान अभिव्यक्त किए।डॉ सीमा पंजवानी ने अपनी मातृभाषा सिंधी में गीत की मनमोहक प्रस्तुति दी। श्री जैनेंद्र दीवान ने संस्कृत के नीति श्लोक का पाठ किया। डॉ. सोमा सेनगुप्ता ने बंगाली कविता का पाठ किया। कार्यक्रम के अंत में हिंदी विभाग के प्राध्यापकों द्वारा मातृभाषा छत्तीसगढ़ी में लक्ष्मण मस्तुरिया द्वारा लिखित गीत मैं बंदत हव दिन रात का गायन किया गया।
उक्त कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राध्यापक,सहायक प्राध्यापक, अतिथि प्राध्यापक शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित हुए।कार्यक्रम का संचालन डॉ .रजनीश उमरे ने किया तथा आभार प्रदर्शन डॉ.अम्बरीश त्रिपाठी ने किया।

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