क्रूरता साबित होने पर दान विलेख रद्द: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वरिष्ठ नागरिकों को दी राहत

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बिलासपुर।
वरिष्ठ नागरिकों के साथ कथित क्रूरता और उपेक्षा के मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाते हुए भतीजे के पक्ष में किए गए दान (उपहार) विलेख को रद्द करने के आदेश को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि वरिष्ठ नागरिक द्वारा संपत्ति का हस्तांतरण इस आशय से किया गया हो कि हस्तांतरण प्राप्त करने वाला उनकी जीवनपर्यंत देखभाल करेगा, तो यह शर्त भले ही लिखित रूप में दर्ज न हो, फिर भी उसे निहित (इम्प्लाइड) माना जाएगा।

क्या था मामला?
मामले में 80 वर्ष से अधिक आयु के दंपति (प्रतिवादी) ने अपनी जमीन अपने भतीजे (याचिकाकर्ता) के नाम दान विलेख के माध्यम से हस्तांतरित की थी। उनका कहना था कि भतीजे ने जीवनभर देखभाल का आश्वासन दिया था। दान के बाद भी वे उसी मकान में रह रहे थे। बाद में भतीजे और उनकी बेटी पर आरोप लगा कि उन्होंने वृद्ध दंपति के साथ दुर्व्यवहार, मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना की, यहां तक कि भोजन, पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं भी बाधित कीं तथा बैंक खाते से बड़ी राशि निकलवाई।
पीड़ितों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और तत्पश्चात माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 5 एवं 23 के तहत भरण-पोषण न्यायाधिकरण में आवेदन प्रस्तुत कर दान विलेख निरस्त करने की मांग की।

न्यायाधिकरण का निर्णय
भरण-पोषण न्यायाधिकरण ने दान विलेख को अमान्य घोषित करते हुए संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया। अपीलीय न्यायाधिकरण ने भी इस आदेश को बरकरार रखा। इसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

हाईकोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
न्यायालय ने कहा कि:
अधिनियम, 2007 की धारा 23 के तहत दान विलेख रद्द करने के लिए यह आवश्यक नहीं कि देखभाल की शर्त स्पष्ट रूप से लिखित हो।
यदि संपत्ति हस्तांतरण का उद्देश्य जीवनपर्यंत देखभाल सुनिश्चित करना था, तो यह शर्त निहित मानी जाएगी।
लाभकारी कानूनों की व्याख्या पीड़ित/लाभार्थी के पक्ष में की जानी चाहिए।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Sudesh Chhikara v. Ramti Devi तथा Urmila Dixit v. Sunil Sharan Dixit का हवाला देते हुए कहा कि यदि हस्तांतरण इस शर्त पर किया गया हो कि मूल मालिक को बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी और हस्तांतरिती ऐसा करने में विफल रहता है, तो दान विलेख निरस्त किया जा सकता है।

अदालत का निष्कर्ष
न्यायालय ने पाया कि दान विलेख का मूल आधार भतीजे द्वारा दिखाई गई देखभाल और स्नेह था। जब वही दायित्व पूरा नहीं किया गया, तो दान का उद्देश्य विफल हो गया। ऐसे में न्यायाधिकरण को दान विलेख निरस्त करने का पूर्ण अधिकार है।

अदालत ने कहा,
“यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यद्यपि स्पष्ट रूप से नहीं, लेकिन निहित रूप से यह शर्त मौजूद है कि प्रतिवादियों के पूरे जीवनकाल में ऐसी देखभाल जारी रहेगी। इसलिए इसे लिखित शर्त के रूप में व्यक्त करना आवश्यक नहीं है।”
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए भरण-पोषण न्यायाधिकरण और अपीलीय न्यायाधिकरण के आदेशों में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

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