गौरांग बोबड़े मौत मामला: 9 साल बाद कोर्ट का फैसला, सभी चार आरोपी बरी, जानिये क्या था वो पूरा मामला

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बिलासपुर के बहुचर्चित गौरांग बोबड़े मौत मामले में अपर सत्र न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी चार आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस हत्या का कारण और आरोपियों की संलिप्तता को ठोस साक्ष्यों के साथ साबित नहीं कर पाई। यह मामला 21 जुलाई 2016 को रामा मैग्नेटो मॉल में हुई संदिग्ध मौत से जुड़ा है, जिसने उस समय पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी थी।

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बिलासपुर 16 जनवरी 2026 | बिलासपुर के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में से एक, गौरांग बोबड़े की मौत के प्रकरण में करीब 9 साल बाद न्यायालय का फैसला सामने आया है। अपर सत्र न्यायालय ने इस मामले में सभी चार आरोपियों—किंशुक अग्रवाल, करण जायसवाल, करण खुशलानी और अंकित मल्होत्रा—को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पुलिस और अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या या हत्या के आरोपों को प्रमाणित करने में असफल रहा।

यह घटना 21 जुलाई 2016 की देर रात की है, जब बिल्डर श्रीरंग बोबड़े के 24 वर्षीय बेटे गौरांग बोबड़े अपने दोस्तों के साथ रामा मैग्नेटो मॉल के टीडीएस बार में पार्टी करने गया था। पार्टी के बाद गौरांग मॉल की सीढ़ियों से लगभग 30 फीट नीचे बेसमेंट में गिर पड़ा। गंभीर रूप से घायल अवस्था में उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। अगले दिन मॉल की सीढ़ियों के नीचे उसकी लाश मिलने से मामला और भी रहस्यमय हो गया।

शुरुआत में पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर दावा किया कि गौरांग को उसके दोस्त अंकित मल्होत्रा ने धक्का दिया था, जिससे वह सीढ़ियों से नीचे गिरा। इसी आधार पर पुलिस ने चारों दोस्तों के खिलाफ आईपीसी की धारा 304 भाग-दो, 120बी और 34 के तहत मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। बाद में जिला अदालत ने आरोपों को और गंभीर मानते हुए धारा 302 (हत्या) के तहत भी आरोप तय किए थे।

मामले ने तब और तूल पकड़ लिया, जब गौरांग के पिता श्रीरंग बोबड़े ने अपने बेटे की हत्या का आरोप लगाते हुए कहा कि आरोपी प्रभावशाली परिवारों से ताल्लुक रखते हैं और पुलिस मामले को दबाने की कोशिश कर रही है। शहर में विरोध प्रदर्शन, कैंडल मार्च और नागरिक आंदोलनों का दौर चला। 28 जुलाई 2016 को परिजन और नागरिक कलेक्टोरेट पहुंचे और पुलिस अधिकारियों के दफ्तरों के बाहर गुलाब के फूल रखकर गांधीगीरी के जरिए विरोध दर्ज कराया।

जांच और सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए। 31 जुलाई 2016 को सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक हुआ, 23 अगस्त 2016 को जिला अदालत ने आरोपियों की जमानत याचिका खारिज की, वहीं 28 सितंबर 2016 को हाईकोर्ट ने भी जमानत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, 16 दिसंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने तीन आरोपियों को जमानत दे दी थी।

करीब नौ साल तक चली सुनवाई के बाद अब अदालत ने यह कहते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि गौरांग की मौत हत्या थी या उसे जानबूझकर सीढ़ियों से धक्का दिया गया था। कोर्ट ने माना कि प्रस्तुत साक्ष्य संदेह से परे अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

इस फैसले के साथ ही बिलासपुर के सबसे चर्चित मामलों में से एक का कानूनी अध्याय समाप्त हो गया, हालांकि यह निर्णय गौरांग के परिजनों और शहरवासियों के लिए भावनात्मक रूप से बेहद कठिन माना जा रहा है।

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