डिफ़ॉल्ट ज़मानत के अविच्छेद्य अधिकार को प्रभावित करने वाला समय-विस्तार आरोपी की उपस्थिति में ही संभव: कोर्ट
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि एनडीपीएस अधिनियम के तहत चार्जशीट (चालान) दाखिल करने की वैधानिक समय-सीमा बढ़ाने का आदेश यदि आरोपी को पेश किए बिना या उसे सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया जाता है, तो यह गंभीर अवैधता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा आदेश संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है, क्योंकि इससे आरोपी का डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अविच्छेद्य (indefeasible) अधिकार प्रभावित होता है।
यह आदेश जस्टिस रुपिंदरजीत चहल की एकलपीठ ने पारित किया, जिसमें गुरदासपुर की विशेष अदालत द्वारा चालान दाखिल करने की अवधि बढ़ाने और आरोपियों की डिफ़ॉल्ट ज़मानत अर्जी खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया गया।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ताओं को 7 मई 2025 को एनडीपीएस अधिनियम की धाराओं 22, 25 और 29 के तहत थाना स्पेशल ऑपरेशन सेल, अमृतसर द्वारा गिरफ्तार किया गया था। 8 मई 2025 को उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया और तब से वे न्यायिक हिरासत में थे।
प्रॉसिक्यूशन 180 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर चालान दाखिल करने में विफल रहा। इसके बाद आरोपियों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 187(2) के तहत डिफ़ॉल्ट ज़मानत की मांग की। हालांकि, विशेष अदालत ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी कि प्रॉसिक्यूशन को पहले ही एक माह का समय-विस्तार दिया जा चुका है।
आरोपियों का पक्ष
आरोपियों की ओर से अधिवक्ता समय संधावलिया ने दलील दी कि 30 अक्टूबर 2025 को समय-विस्तार की अर्जी दाखिल की गई और 31 अक्टूबर 2025 को उसे मंजूरी दे दी गई, लेकिन आरोपियों को न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही उन्हें अदालत में पेश किया गया। चूँकि यह विस्तार सीधे तौर पर उनके डिफ़ॉल्ट ज़मानत के वैधानिक अधिकार को प्रभावित करता है, इसलिए यह आदेश कानूनन अस्थिर है।
राज्य का पक्ष
राज्य की ओर से कहा गया कि अपराध गंभीर प्रकृति का है और समय-विस्तार 180 दिनों की अवधि समाप्त होने से पहले ही मांगा और प्रदान किया गया था, इसलिए इसमें कोई अवैधता नहीं है।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने संविधान पीठ के फैसले Sanjay Dutt v. State through CBI पर भरोसा करते हुए कहा कि वैधानिक अवधि समाप्त होते ही डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अधिकार उत्पन्न हो जाता है, जब तक कि विधि अनुसार वैध समय-विस्तार न दिया गया हो।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय Jigar v. State of Gujarat का भी हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि समय-विस्तार पर विचार करते समय आरोपी की उपस्थिति—चाहे भौतिक हो या वर्चुअल—अनिवार्य है, क्योंकि ऐसा विस्तार आरोपी के अविच्छेद्य अधिकार को प्रभावित करता है।
पीठ ने पाया कि समय-विस्तार के आदेश में आरोपियों की उपस्थिति या उनकी आपत्तियों का कोई उल्लेख नहीं था। इसे अदालत ने केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन माना।
क्या दिया आदेश?
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने 4 नवंबर 2025 का विवादित आदेश याचिकाकर्ताओं के संबंध में रद्द कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि उन्हें डिफ़ॉल्ट ज़मानत पर रिहा किया जाए, बशर्ते वे संबंधित अदालत की संतुष्टि अनुसार जमानत और ज़मानतदार प्रस्तुत करें।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियाँ मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं मानी जाएंगी।
यह फैसला डिफ़ॉल्ट ज़मानत को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़ते हुए आपराधिक न्याय प्रणाली में आरोपी के प्रक्रिया संबंधी अधिकारों को और मजबूत करता



