
दुर्ग। शास.वि. या.ता.स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय दुर्ग के हिन्दी विभाग तथा फिल्म सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में रुसा 2.0 के तहत छत्तीसगढ़ी साहित्यकार संजीव बख्शी के उपन्यास “भूलन कांदा” पर व्याख्यान एवं इसी उपन्यास पर आधारित भूलन द मेज़ फ़िल्म का प्रदर्शन किया गया। महाविद्यालय के प्राचार्य ने अपने संबोधन में कहा कि क्षेत्रीय सिनेमा समाज की वास्तविकताओं को दर्शाने का सशक्त माध्यम है। “भूलन द मेज” जैसी फिल्में हमारी लोकसंस्कृति, परंपरा और मानवीय मूल्यों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती है। साहित्य हमें दृष्टि देती है और समाज से जोड़ती हैं।
मुख्य वक्ता कथाकार संजीव बख्शी ने विद्यार्थियों से संवाद करते हुए फिल्म निर्माण की पूरी प्रक्रिया को विस्तार से बताया। उपन्यास के उद्देश्य पर
प्रकाश डालते हुए कहा कि भूलन कांदा के मिथ को लेकर उसे यथार्थ से जोड़ते हुए वर्तमान व्यवस्था को समाज के समक्ष लाना यही मूल उद्देश्य रहा । साथ ही ग्रामीण संस्कृति की बारिकियों को आज के समाज में निरूपित करना है।हिंदी विभागाध्यक्ष ने बताया कि इस कार्यक्रम का आयोजन विद्यार्थियों को क्षेत्रीय संस्कृति, लोकजीवन और सामाजिक संदेशों से परिचित कराने के उद्देश्य से किया गया। फिल्म सोसायटी छायापट के संयोजक डॉ एस डी देशमुख ने जानकारी दी कि फिल्म प्रदर्शन के दौरान विद्यार्थियों ने बड़ी रुचि और उत्साह के साथ फिल्म देखा। कार्यक्रम के संयोजक एवं संचालक डॉ अम्बरीष त्रिपाठी ने बताया कि फिल्म में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन, सामाजिक संबंधों और लोक परंपराओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिससे विद्यार्थियों को अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर के बारे में नई जानकारी प्राप्त हुई।
फिल्म प्रदर्शन के पश्चात विद्यार्थियों के बीच चर्चा सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें विद्यार्थियों ने फिल्म की कहानी, संदेश और सामाजिक महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए। उक्त कार्यक्रम में डॉ प्रज्ञा कुलकर्णी,डॉ अनुपमा कश्यप, डॉ संजू सिन्हा, डॉ एलिजाबेथ भगत, डॉ प्रीति तन्ना टांक,अतिथि प्राध्यापक ,हिंदी विभाग के अतिथि प्राध्यापक डॉ.ओमकुमारी देवांगन , डॉ .रमणी चंद्राकर, डॉ. लता गोस्वामी, डॉ. शारदा सिंह एवं शोधार्थी एवं महाविद्यालय के विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। डॉ रजनीश उमरे ने आभार प्रदर्शन किया ।

