बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने विवाह का झूठा प्रलोभन देकर दुष्कर्म तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य शासन की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि वयस्क पीड़िता स्वयं की सहमति से आरोपी के साथ जाती है और दोनों के बीच सहमति से संबंध स्थापित होते हैं, तो ऐसे मामलों में जबरदस्ती या अपहरण का अपराध सिद्ध नहीं होता।
यह आपराधिक अपील राज्य शासन द्वारा विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी अत्याचार), रायपुर के 31 अगस्त 2023 के निर्णय के विरुद्ध दायर की गई थी। विशेष न्यायालय ने आरोपी धर्मेंद्र कुमार को अपहरण, दुष्कर्म और एससी/एसटी एक्ट के आरोपों से बरी कर दिया था।
मेडिकल रिपोर्ट में जबरदस्ती की पुष्टि नहीं
प्रकरण के अनुसार, पीड़िता ने 14 जनवरी 2022 को थाना इंदागांव, जिला गरियाबंद में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि 11 जनवरी 2022 को आरोपी उसे बाइक से अपने गांव ले गया और विवाह का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाए। बाद में आरोपी ने कथित रूप से यह कहते हुए विवाह से इनकार कर दिया कि वह अनुसूचित जाति से है।
जांच के दौरान कराए गए चिकित्सकीय परीक्षण में डॉक्टर ने पीड़िता के शरीर पर किसी प्रकार की आंतरिक या बाहरी चोट नहीं पाई। मेडिकल रिपोर्ट में जबरदस्ती यौन संबंध होने की पुष्टि नहीं हो सकी।
पीड़िता के बयान को माना निर्णायक
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पीड़िता के न्यायालयीन बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था। पीड़िता अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी और कई बार रात में स्वयं मिलने भी गई। उसने डॉक्टर के समक्ष भी यह कहा था कि जबरदस्ती शारीरिक संबंध नहीं बनाए गए। अदालत में उसने यह भी स्वीकार किया कि पुलिस द्वारा तैयार रिपोर्ट पर उसने केवल हस्ताक्षर किए थे तथा बयान पुलिस और परिजनों के कहने पर दिया था।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष जबरदस्ती, अपहरण या बलपूर्वक संबंध स्थापित करने के आरोप सिद्ध करने में असफल रहा है। परिणामस्वरूप, राज्य शासन की अपील निरस्त करते हुए आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को बरकरार रखा गया।
यह फैसला सहमति और आपराधिक दायित्व के प्रश्न पर न्यायालय की स्पष्ट व्याख्या के रूप में देखा जा रहा है।


