
बिलासपुर,
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में रिश्वतखोरी के मामले में दोषी ठहराए गए श्रम निरीक्षक को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की एकल पीठ ने 11 मार्च 2026 को यह निर्णय सुनाया।
न्यायालय ने सुरेश कुर्रे द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए विशेष न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 के तहत तीन साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।
क्या था मामला
यह मामला जशपुर जिले में कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने वाले एक एनजीओ की शिकायत से जुड़ा था। आरोप था कि श्रम निरीक्षक ने भुगतान जारी कराने के बदले ₹40,000 की रिश्वत मांगी थी। शिकायत के आधार पर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने ट्रैप कार्रवाई कर आरोपी से रकम बरामद की थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकृति को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। न्यायालय ने कहा कि:
कथित मांग का आधार केवल शिकायतकर्ता का बयान था, जिसकी स्वतंत्र गवाहों से पुष्टि नहीं हुई।
पंच गवाहों ने न तो रिश्वत मांगने की बात सुनी और न ही लेन-देन स्पष्ट रूप से देखा।
जांच एजेंसी यह साबित नहीं कर पाई कि शिकायतकर्ता का भुगतान वास्तव में लंबित था।
रिकॉर्ड से स्पष्ट हुआ कि भुगतान जारी करने का अधिकार श्रम अधिकारी के पास था, न कि श्रम निरीक्षक के पास।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी कमजोर
अभियोजन द्वारा प्रस्तुत रिकॉर्डेड बातचीत को भी अदालत ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि इनका फोरेंसिक सत्यापन नहीं किया गया और न ही इन्हें विधिसम्मत तरीके से प्रमाणित किया गया।
महत्वपूर्ण टिप्पणी
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल रिश्वत की रकम की बरामदगी दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक रिश्वत की मांग और स्वैच्छिक स्वीकृति स्पष्ट रूप से सिद्ध न हो।
विवाद का पहलू भी सामने आया
न्यायालय ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता और विभाग के बीच पूर्व विवाद थे, जिसमें वसूली की कार्रवाई भी शामिल थी। इससे झूठे आरोप की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
अंतिम फैसला
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया और निचली अदालत का दोषसिद्धि आदेश निरस्त कर दिया।
