हाईकोर्ट न्यूज : DNA रिपोर्ट ने पलटा पूरा मामला: हाईकोर्ट ने POCSO केस में 20 साल की सजा रद्द कर आरोपी को किया बरी

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बिलासपुर । छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट और अपहरण के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए 20 साल की सजा काट रहे आरोपी को बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में पेश किए गए सबूत आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। सबसे अहम बात यह रही कि डीएनए जांच में यह साबित हो गया कि पीड़िता के गर्भ में पल रहे भ्रूण का जैविक पिता आरोपी नहीं था।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने रायपुर की फास्ट ट्रैक पॉक्सो कोर्ट द्वारा 27 सितंबर 2024 को सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए आरोपी लक्ष्मीनारायण उर्फ लक्ष्मण को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत जेल से रिहा किया जाए

क्या था मामला?

24 मई 2022 को रायपुर के डीडी नगर थाना क्षेत्र से 17 साल 3 महीने की एक स्कूली छात्रा घर से निकली थी और वापस नहीं लौटी। परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने अपहरण का मामला दर्ज किया। करीब एक सप्ताह बाद 31 मई 2022 को छात्रा को मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा से बरामद किया गया।जांच में पुलिस ने आरोप लगाया कि राजस्थान के जोधपुर जिले के फलोदी निवासी लक्ष्मीनारायण छात्रा को रायपुर से नागपुर, जोधपुर और फिर छिंदवाड़ा लेकर गया और उसके साथ दुष्कर्म किया।

गर्भपात के बाद आई डीएनए रिपोर्ट बनी अहम सबूत

मेडिकल जांच में छात्रा गर्भवती पाई गई। बाद में एम्स रायपुर में उसका गर्भपात कराया गया। गर्भपात के बाद भ्रूण का डीएनए परीक्षण कराया गया, जिसकी रिपोर्ट में सामने आया कि आरोपी उस भ्रूण का जैविक पिता नहीं है।हाईकोर्ट ने माना कि यह रिपोर्ट अभियोजन पक्ष की कहानी पर गंभीर सवाल खड़े करती है और आरोपी को इसका लाभ मिलना चाहिए।

पीड़िता अपनी मर्जी से गई थी: बचाव पक्ष

आरोपी के वकील ने अदालत में दलील दी कि छात्रा अपनी इच्छा से आरोपी के साथ रायपुर से नागपुर, जोधपुर और छिंदवाड़ा गई थी। यात्रा के दौरान वह कई होटलों और बसों में रुकी, लेकिन उसने किसी से भी मदद नहीं मांगी और न ही किसी तरह का विरोध किया। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि छात्रा को बहला-फुसलाकर ले जाने का कोई ठोस सबूत नहीं है।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने सभी साक्ष्यों की समीक्षा के बाद कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। अदालत ने माना कि केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसी आधार पर आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए उसकी सजा रद्द कर दी गई और उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

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