आपराधिक रिकॉर्ड छिपाकर जमानत मांगना कानून का दुरुपयोग, NDPS मामलों में धारा 37 सर्वोपरि: उड़ीसा हाईकोर्ट

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कटक, 14 मई 2026। Orissa High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जमानत याचिका दाखिल करते समय आरोपी पर अपने आपराधिक रिकॉर्ड और लंबित मामलों की पूरी एवं निष्पक्ष जानकारी देने का “गंभीर दायित्व” होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई आरोपी अपने आपराधिक antecedents (पूर्व आपराधिक इतिहास) को छिपाता है, तो यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।

न्यायमूर्ति Justice G. Satapathy की एकल पीठ ने 8 मई 2026 को दिए गए आदेश में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन NDPS Act जैसे विशेष कानूनों में यह अधिकार धारा 37 की कठोर शर्तों को समाप्त नहीं करता।

405 ग्राम ब्राउन शुगर मामले में मांगी थी जमानत

मामला आरोपी स्के. मंताज से जुड़ा है, जिसने BNSS की धारा 483 के तहत जमानत की मांग की थी। आरोपी जुलाई 2022 से न्यायिक हिरासत में है। उस पर 405 ग्राम ब्राउन शुगर रखने का आरोप है, जो NDPS Act के तहत “व्यावसायिक मात्रा” की श्रेणी में आता है।

याचिकाकर्ता ने अदालत में दलील दी कि लंबे समय से मुकदमा लंबित होने और 24 में से केवल 4 गवाहों की गवाही होने के कारण उसके त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। वहीं राज्य सरकार ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने अपने खिलाफ दर्ज छह अन्य NDPS मामलों की जानकारी छिपाई है।

आपराधिक इतिहास छिपाना गंभीर मामला

हाईकोर्ट ने कहा कि जमानत जैसी विवेकाधीन राहत पाने के लिए आरोपी को सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा करना अनिवार्य है। अदालत ने Zeba Khan v. State of Uttar Pradesh के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक इतिहास छिपाना न्याय व्यवस्था की जड़ पर प्रहार करने जैसा है।

अदालत ने टिप्पणी की कि आरोपियों द्वारा अपने पूर्व मामलों को छिपाकर राहत लेने की प्रवृत्ति चिंताजनक है। कोर्ट ने कहा कि यदि आपराधिक रिकॉर्ड, पूर्व जमानत निरस्तीकरण या हिरासत की अवधि जैसी जानकारी छिपाई जाती है, तो इससे अनुचित तरीके से जमानत मिलने की संभावना बन जाती है।

अनुच्छेद 21 बनाम NDPS Act की धारा 37

कोर्ट ने State of Punjab v. Sukhwinder Singh @ Gora मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि NDPS Act में धारा 37 की “ट्विन कंडीशंस” को दरकिनार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि व्यावसायिक मात्रा से जुड़े मामलों में जमानत तभी दी जा सकती है जब अदालत संतुष्ट हो कि आरोपी प्रथम दृष्टया दोषी नहीं है और भविष्य में अपराध नहीं करेगा।

पीठ ने कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार महत्वपूर्ण संवैधानिक गारंटी है, लेकिन NDPS मामलों में इसे धारा 37 के साथ पढ़ा जाएगा, उसके स्थान पर नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले से अलग बताया मामला

याचिकाकर्ता ने Mohd Muslim @ Hussain v. State (NCT of Delhi) का हवाला देकर लंबे समय से जेल में रहने के आधार पर जमानत मांगी थी। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि उस मामले में आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था, जबकि वर्तमान मामले में आरोपी छह अन्य NDPS मामलों में भी शामिल है, जिनमें दो व्यावसायिक मात्रा से जुड़े हैं।

“जमानत अपवाद, इनकार नियम”

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में दोहराया कि NDPS Act के मामलों में “जमानत देना अपवाद है और इनकार करना नियम।” अदालत ने माना कि आरोपी के खिलाफ छह आपराधिक मामले होना ही यह दर्शाता है कि वह धारा 37 की शर्तों को पूरा नहीं करता।

हालांकि आरोपी की साढ़े तीन साल की हिरासत को देखते हुए अदालत ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि यदि कोई अन्य कानूनी बाधा न हो तो मामले की सुनवाई शीघ्र पूरी की जाए।

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