बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लगभग 21 साल पुराने अपहरण और दुष्कर्म मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि घटना के समय युवती की उम्र 16 वर्ष से कम थी। साथ ही मामले की परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे।
मामले की सुनवाई हाईकोर्ट की एकलपीठ में न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने की। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी द्वारा युवती का जबरन अपहरण कर शादी करने या अवैध संबंध बनाने के आरोपों को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य पेश नहीं किए गए।
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2005 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 366 और 376 के तहत दोषी करार देते हुए सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी युवती को अपने साथ भोपाल ले गया था, जहां उसके साथ दुष्कर्म किया गया। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
उम्र संबंधी साक्ष्यों पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजों और गवाहों के बयानों का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि को प्रमाणित करने के लिए उस व्यक्ति को अदालत में पेश नहीं किया गया, जिसने संबंधित प्रविष्टि दर्ज की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल स्कूल के दाखिल-खारिज रजिस्टर के आधार पर किसी की उम्र तय नहीं की जा सकती।
इसके अलावा मेडिकल रिपोर्ट में भी युवती की उम्र 15 से 17 वर्ष के बीच बताई गई थी, जिससे अभियोजन पक्ष का दावा पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया।
परिस्थितियों को माना सहमति का संकेत
हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों पर भी विस्तार से टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि युवती लगभग एक महीने तक आरोपी के साथ भोपाल में रही। इस दौरान वह कई लोगों के संपर्क में आई और सार्वजनिक स्थानों पर भी गई, लेकिन उसने किसी के सामने जबरदस्ती, अपहरण या दुष्कर्म की शिकायत नहीं की।
कोर्ट ने इन परिस्थितियों को सहमति की ओर संकेत मानते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इसके आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी को दोषमुक्त करते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला निरस्त कर दिया।


