अंबेडकर जयंती पर ‘बाबा साहेब का प्रदेय’ विषय पर विचार गोष्ठी, विद्यार्थियों ने रखे प्रेरक विचार

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शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय में आयोजन, शिक्षा, समानता और संवैधानिक मूल्यों पर हुई गहन चर्चा


रायपुर। डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय के इतिहास विभाग द्वारा ‘बाबा साहेब का प्रदेय’ विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने अंबेडकर के जीवन, संघर्ष, शिक्षा, सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक चिंतन के साथ-साथ उनके संवैधानिक योगदान पर विस्तार से चर्चा की।

महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अजय कुमार सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि अंबेडकर के विचारों को केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें व्यवहारिक जीवन में उतारना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब ने अपनी मेधा, संघर्ष और दूरदर्शिता से समाज निर्माण की मजबूत नींव रखी, जिससे भारतीय संविधान केवल शासन प्रणाली न होकर जीवनशैली का हिस्सा बन गया।

कार्यक्रम की शुरुआत स्वागत भाषण से हुई, जिसमें इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल पांडेय ने अंबेडकर द्वारा श्रमिकों के लिए बनाए गए कानूनों को संवेदनशील और मानवीय बताया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अंबरीश त्रिपाठी ने किया, जिन्होंने बाबा साहेब के जीवन एवं उनके दर्शन पर प्रकाश डाला।

विद्यार्थियों ने रखे विचार:
गोष्ठी में विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक अपने विचार प्रस्तुत किए। संजना बंजारे ने समानता को संविधान की आत्मा बताया, वहीं तुपेश कुमार ने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के महत्व पर बल दिया। भावेन्द्र कश्यप ने महिला अधिकारों में अंबेडकर के योगदान को युगांतकारी बताया।

डिपलेश कुमार ने वर्तमान समाज में जाति व्यवस्था और महिला अधिकारों की स्थिति पर प्रश्न उठाए। तारणदास ने अंबेडकर के प्रसिद्ध कथन—“शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पियेगा वह दहाड़ेगा”—को दोहराते हुए शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया। दीपेंद्र बारले ने अंबेडकर के प्रारंभिक जीवन में झेली गई कठिनाइयों का उल्लेख किया।

निलेश निराला ने अंबेडकर को नारी मुक्ति का अग्रदूत बताते हुए नवबौद्धों की इक्कीस प्रतिज्ञाओं पर चर्चा की, जबकि गीतू यादव ने शिक्षा और आत्मगौरव के महत्व को रेखांकित किया।

मुख्य वक्ताओं के विचार:
प्रथम मुख्य वक्ता, राजनीति विज्ञान की व्याख्याता डॉ. राजेश्वरी जोशी ने कहा कि अंबेडकर का जीवन संघर्षमय रहा, लेकिन उन्होंने शिक्षा के माध्यम से शोषित वर्गों के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया। उनके राष्ट्र निर्माण में योगदान के कारण उन्हें भारतीय संविधान का जनक कहा जाता है।

द्वितीय मुख्य वक्ता डॉ. रजनीश उमरे ने कहा कि बाबा साहेब संघर्षशील समाज के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उन्होंने अपने भीतर के असंतोष को तार्किक संवाद में बदलकर समाज को नई दिशा दी और अपने विचारों को कभी घृणा का रूप नहीं लेने दिया।

वृत्तचित्र का प्रदर्शन एवं आभार:
कार्यक्रम के दौरान डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन पर आधारित वृत्तचित्र का भी प्रदर्शन किया गया। अंत में डॉ. ज्योति धारकर ने सभी उपस्थितजनों का आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर डॉ. अभिनेष सुराना, डॉ. जगजीत कौर सलूजा, डॉ. राकेश रंजन सिंह, डॉ. गोविंद गुप्ता, डॉ. रश्मि गौर, श्री राम किशोर, श्री निखिल देशलहरा सहित बड़ी संख्या में प्राध्यापक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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