
गरियाबंद 7 अप्रैल 2026। छत्तीसगढ़ में भले ही सरकार बदल गयी हो, लेकिन सरकारी विभाग में मनमानी और भ्रष्टाचार कम होने का नाम ही नही ले रहा है। ताजा मामला गरियाबंद जिले का है, जहां स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा साल 2025 में जिले के 116 विद्यायलों में शौचालय निर्माण के लिए करोड़ों रूपये का फंड आबंटन किया गया था। लेकिन इन शौचालयों का निर्माण शुरू होने से पहले ही दुर्ग की ठेका कंपनी को निर्माण एजेंसी आदिवासी विभाग द्वारा 40 प्रतिशत राशि का एडवांस में भुगतान कर दिया गया। वहीं कार्यादेश जारी होने के सात माह बाद भी ठेका कंपनी द्वारा महज 23 स्कूलों में ही शौचालय का निर्माण कार्य शुरू किया जा सका है। जिस पर अब कलेक्टर ने कड़ा एक्शन लेते हुए शेष बचे निर्माण कार्यो को निरस्त कर पैसा वसूली का आदेश जारी किया है।
गौरतलब है कि स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं को दुरूस्त करने की दिशा में लगातार बड़े फैसले ले रही है। लेकिन सरकार के इन फैसलों पर राजनीति और प्रशासनिक संरक्षण में ठेका एजेंसिया पलीता लगाती नजर आ रही है। जीं हां कुछ ऐसा ही खेल गरियाबंद जिले के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के नाम पर सामने आया है। जिसने सरकारी सिस्टम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन शौचालयों के निर्माण से सरकारी स्कूल के छात्रों को राहत मिलनी थी, वही योजनाएं लापरवाही और सुस्ती की भेंट चढ़ गईं।
दरअसल ये पूरा मामला शिक्षा विभाग से जुड़ा है, जहां 116 स्कूलों में शौचालय निर्माण के लिए करीब 1.54 करोड़ रूपये आबंटित किये गये थे। शौचालय निर्माण का जिम्मा आदिवासी विकास विभाग के माध्यम से दुर्ग के कंचन कंस्ट्रक्शन नामक फर्म को सौंपा गया था। तत्कालीन सहायक संचालक नवीन भगत द्वारा दिए गए इस ठेके में शुरुआत से ही अनियमितताएं नजर आने लगी थीं। हैरानी की बात यह है कि निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही आदिवासी विभाग ने फर्म को 40 प्रतिशत राशि 61.88 लाख रुपये एडवांस में जारी कर दी गई। लेकिन ठेका कंपनी ने एडवांस में पैसा लेने के बाद भी काम का समय पर करने में दिलचस्पी नही दिखाई।
जांच में हुए खुलासे के बाद कलेक्टर ने निरस्त किया काम
गरियाबंद जिले में सरकारी स्कूलों में शौचालय निर्माण के लिए आदिवासी विकास विभाग ने सात माह पहले कार्यादेश जारी किया था। लेकिन सात माह बीतने के बाद भी जमीनी हकीकत बेहद निराशाजनक रही। गरियाबंद कलेक्टर भगवान सिंह ने जब इस पूरे प्रकरण की जांच कराई तो चैकाने वाली जानकारी सामने आयी। जांच में सामने आया कि 116 में से सिर्फ 23 स्कूलों में ही काम शुरू हुआ, वह भी आधा अधूरा था। जबकि बाकी जगहों पर ठेका कंपनी ने निर्माण कार्य शुरू ही नही किया था। इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए कलेक्टर भगवान सिंह उइके ने सख्त रुख अपनाते हुए 1 करोड़ 23 लाख रुपये की लागत वाले 93 कार्यों को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने का आदेश जारी किया है। इसके साथ ही ठेका कंपनी को एडवांस में जारी किये गये पैसों की रिकव्हरी के लिए भी पत्र जारी किया गया है।
15 दिनों में पैसा वापस नही करने पर होगी कुर्की की कार्रवाई
प्रशासन ने इस पूरे प्रकरण को शासकीय कार्य में घोर लापरवाही मानते हुए संबंधित फर्म को एडवांस में जारी रकम में से 45.85 लाख रुपये 15 दिनों के भीतर सरकारी कोष में जमा करने का अल्टीमेटम दिया है। साथ ही स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि समय सीमा में राशि जमा नहीं होने पर राजस्व वसूली की कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कलेक्टर के इस आदेश के बाद हड़कंप मचा हुुआ है। इसके साथ ही इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर सरकारी सिस्टम की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा दिया है। सवाल यह भी उठता है कि आखिर बिना काम शुरू हुए इतनी बड़ी रकम एडवांस में कैसे जारी कर दी गई ? क्या एडवांस में पैसे जारी करने के लिए किसी का दबाव था ? आखिर महीनों तक इसकी मॉनिटरिंग क्यों नहीं की गई ? अगर समय रहते सख्ती नहीं बरती जाती, तो यह मामला और बड़ा घोटाला बन सकता था। ऐसे में अब ये देखने वाली बात होगी कि क्या कलेक्टर आदिवासी विभाग के उन अफसरों पर भी एक्शन लेंगे, जिन्होने निर्माण कार्य शुरू हुए बगैर ही लाखों रूपये का फंडें ठेका कंपनी को एडवांस में जारी कर दिये। ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा।


