पूर्व डिप्टी सीएम के बेटे-बहू को सुनाई उम्रकैद की सजा, तीहरे हत्याकांड में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सजा बरकरार

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भिलाई-कोरबा क्षेत्र से जुड़े बहुचर्चित तीनहरे हत्याकांड में हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है, जबकि तीन अन्य आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया है। यह मामला पारिवारिक विवाद और साजिश से जुड़ा हुआ था।

 

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बिलासपुर, 28 मार्च 2026।छत्तीसगढ़ के चर्चित भैसमा तिहरे हत्याकांड में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व डिप्टी सीएम स्वर्गीय प्यारेलाल कंवर के परिवार से जुड़े इस मामले में अदालत ने मुख्य आरोपी हरभजन कंवर और उसकी पत्नी धनकुंवर को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। वहीं, मामले में शामिल तीन अन्य आरोपियों—परमेश्वर कंवर, सुरेंद्र सिंह कंवर और रामप्रसाद मन्नेवार—को साक्ष्यों के अभाव में आरोपमुक्त कर दिया गया।

क्या था पूरा मामला?

यह सनसनीखेज वारदात 21 अप्रैल 2021 की सुबह करीब 4:15 बजे कोरबा शहर से लगे भैसमा गांव में हुई थी। मृतकों में हरीश कंवर, उनकी पत्नी सुमित्रा कंवर और उनकी चार वर्षीय मासूम बेटी आशी शामिल थीं। तीनों की निर्मम हत्या ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था।जांच के दौरान सामने आया कि हरीश कंवर का अपने बड़े भाई हरभजन कंवर से जमीन को लेकर विवाद चल रहा था। इसी विवाद ने खतरनाक रूप ले लिया और हत्या की साजिश रची गई।

साजिश और खुलासा

पुलिस जांच में यह तथ्य सामने आया कि हरभजन कंवर ने अपनी पत्नी धनकुंवर और उसके भाइयों के साथ मिलकर इस हत्या की योजना बनाई थी। घटना के दौरान हरीश की मां भी घर में मौजूद थीं और उन्होंने पूरी वारदात देखी थी, जो मामले में अहम गवाह बनीं।सीसीटीवी फुटेज में भी हरभजन और परमेश्वर की मौजूदगी सामने आई थी। वारदात के बाद आरोपियों ने सबूत मिटाने की कोशिश भी की। पुलिस के अनुसार, परमेश्वर कंवर ने घटना के बाद अपने कपड़े जला दिए और खुद को बचाने के लिए अस्पताल में भर्ती हो गया।

निचली अदालत और हाईकोर्ट का फैसला

जिला एवं सत्र न्यायालय ने सभी पांच आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन किया और पाया कि मुख्य साजिशकर्ता हरभजन और उसकी पत्नी के खिलाफ पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।इसी आधार पर अदालत ने उनकी सजा को बरकरार रखा, जबकि अन्य तीन आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने पर उन्हें बरी कर दिया गया।

राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़ा मामला

यह मामला इसलिए भी खास रहा क्योंकि मृतक परिवार अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री स्व. प्यारेलाल कंवर से जुड़ा हुआ था। प्यारेलाल कंवर आदिवासी समाज के एक वरिष्ठ नेता थे और 1993 से 1998 तक राज्य के उपमुख्यमंत्री रहे थे।हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल एक बहुचर्चित मामले का निर्णायक मोड़ है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पारिवारिक विवाद किस तरह गंभीर अपराध में बदल सकता है। साथ ही, यह न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की अहमियत को भी रेखांकित करता है।

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