“जब तक पेनिट्रेशन न हो, नहीं कह सकते रेप” हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा, केवल प्राइवेट पार्ट रगड़ना नहीं है बलात्कार, सजा कर दी आधी

Spread the love

20 वर्ष पुराने दुष्कर्म मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए आरोपी की सजा आधी कर दी है। कोर्ट ने कहा कि पेनिट्रेशन (प्रवेशन) साबित न होने पर अपराध को बलात्कार नहीं बल्कि बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में रखा जाएगा। इसी आधार पर सात साल की सजा को घटाकर साढ़े तीन साल किया गया।

 

highcourt 4
 

बिलासपुर 19 फरवरी 2026। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बलात्कार के अपराध को सिद्ध करने के लिए पेनिट्रेशन का प्रमाण आवश्यक है। यदि यह तत्व संदेह से परे साबित नहीं होता, तो अपराध की प्रकृति बदल सकती है। यह फैसला जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने 16 फरवरी 2026 को सुनाया।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 20 साल पुराने रेप मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी की सजा को आधा कर दिया है। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रेप के लिए 7 साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे रेप के प्रयास में बदलते हुए सजा को साढ़े 3 साल कर दिया। कोर्ट ने कहा, पेनिट्रेशन साबित नहीं हुआ, इसलिए यह रेप नहीं बल्कि रेप का प्रयास है।

यह मामला धमतरी जिले का है, जहां 21 मई 2004 को एक महिला के साथ कथित रूप से दुष्कर्म की घटना हुई थी। अभियोजन के अनुसार, पीड़िता उस समय घर पर अकेली थी। आरोपी ने उसे दुकान जाने का झांसा देकर अपने घर बुलाया, जहां उसके हाथ-पैर बांध दिए गए, मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया और उसके साथ जबरन यौन कृत्य किए गए। घटना के बाद पीड़िता की शिकायत पर मामला दर्ज किया गया।

अप्रैल 2005 में धमतरी की अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(1) के तहत दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के सश्रम कारावास और धारा 342 के तहत छह महीने की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया था।

आरोपी ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान मेडिकल रिपोर्ट, फॉरेंसिक साक्ष्य और पीड़िता के बयान की गहन समीक्षा की गई। अदालत ने पाया कि फॉरेंसिक रिपोर्ट में वीर्य के साक्ष्य मिले, लेकिन पूर्ण पेनिट्रेशन का स्पष्ट प्रमाण नहीं था। पीड़िता के बयान में भी कुछ विरोधाभास पाए गए। क्रॉस-एग्जामिनेशन में आंशिक पेनिट्रेशन की संभावना जताई गई, परंतु इसे निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सका। डॉक्टर की गवाही भी बलात्कार की पुष्टि के संबंध में स्पष्ट नहीं थी।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि “रेप का आवश्यक तत्व पेनिट्रेशन है, न कि केवल डिस्चार्ज।” अदालत ने माना कि आरोपी का इरादा आपराधिक था और उसने हिंसक यौन हमला किया, लेकिन साक्ष्यों के आधार पर इसे बलात्कार नहीं कहा जा सकता। इसी कारण दोषसिद्धि को धारा 376 से बदलकर धारा 376 सहपठित 511 (बलात्कार का प्रयास) में परिवर्तित कर दिया गया।

नए आदेश के तहत आरोपी को साढ़े तीन वर्ष के सश्रम कारावास और 200 रुपये जुर्माने की सजा दी गई है। धारा 342 के तहत छह महीने की सजा पूर्ववत रखी गई है। दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी। आरोपी ने ट्रायल के दौरान लगभग एक वर्ष एक माह जेल में बिताया था, जिसे सजा में समायोजित किया जाएगा। वर्तमान में जमानत पर चल रहे आरोपी को दो माह के भीतर ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

× How can I help you?