बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में थाना सिरगिट्टी में दर्ज मारपीट और लूट के मामले की एफआईआर को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों को पूर्ण रूप से स्वीकार करने पर भी अपराध के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं होते। ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
यह आदेश मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने पारित किया।
मामला क्या था
प्रकरण में याचिकाकर्ता सुमन यादव, इंदु चंद्रा, नंद राठौर, मोहम्मद इस्लाम और राहुल जायसवाल के विरुद्ध सितंबर 2024 में अपराध दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता के अनुसार, सितंबर की एक रात ग्रामीण बैंक तिफरा के पास आरोपियों ने गाली-गलौज कर मारपीट की और सोने की चेन छीन ली।
देरी और रिकॉर्ड पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि एफआईआर दर्ज करने में लगभग 13 घंटे की देरी हुई, जो संदेहास्पद है। उनका कहना था कि घटना से पहले 112 नंबर पर सूचना दी गई थी और ‘अभिव्यक्ति’ ऐप के माध्यम से भी शिकायत दर्ज कराई गई थी।
खंडपीठ ने उपलब्ध रिकॉर्ड, पूर्व शिकायतों और एफआईआर में देरी जैसे पहलुओं पर विचार करते हुए कहा कि अभियोजन की कहानी पर गंभीर संदेह उत्पन्न होता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब आरोपों से अपराध के आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होते, तो न्यायालय अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग कर कार्यवाही को समाप्त कर सकता है।
एफआईआर पूर्णतः निरस्त
कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए थाना सिरगिट्टी, जिला बिलासपुर में दर्ज अपराध क्रमांक 624/2024 को सभी पांचों याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध पूर्णतः निरस्त कर दिया।
इस फैसले को आपराधिक मामलों में एफआईआर की वैधानिकता और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


