वाहन सुपुर्दनामा के समय मुआवजा तय करना अधिकार क्षेत्र से बाहर,  बीमा कंपनी को सुने बिना जिम्मेदारी थोपना प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध: हाईकोर्ट

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वाहन सुपुर्दनामा से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि बीएनएसएस, 2023 की धारा 503 के तहत अंतरिम रूप से वाहन छोड़े जाने के समय आपराधिक न्यायालय मुआवजा तय करने या उसकी वसूली का आदेश नहीं दे सकता।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सत्र न्यायालय, कोरबा द्वारा लगाए गए 1,70,819 रुपये मुआवजे की शर्त को अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए रद्द कर दिया। हालांकि, वाहन सुपुर्दनामा पर छोड़ने से संबंधित शेष आदेश को यथावत रखा गया है।
मामला याचिकाकर्ता अमन राजपाल से जुड़ा है, जिनके वाहन से कथित रूप से एक विद्युत ट्रांसफार्मर को नुकसान पहुंचने का आरोप था। इस मामले में सत्र न्यायालय, कोरबा ने बीएनएसएस की धारा 503 के तहत वाहन सुपुर्दनामा पर छोड़ते समय मुआवजा राशि जमा करने की शर्त लगाई थी और बीमा कंपनी से भुगतान कराए जाने का संकेत भी दिया था।

याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि सुपुर्दनामा की कार्यवाही केवल वाहन की सुरक्षित अभिरक्षा और ट्रायल के दौरान प्रस्तुतिकरण तक सीमित होती है। इस स्तर पर न तो नागरिक देयता तय की जा सकती है, और न ही मुआवजे की वसूली का आदेश दिया जा सकता है।
यह भी कहा गया कि बीमा कंपनी को पक्षकार बनाए बिना उस पर देयता डालना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
वहीं, राज्य शासन की ओर से वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने की दलील दी गई, लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि सत्र न्यायालय द्वारा लगाई गई शर्तें विधिक अधिकार क्षेत्र से परे हैं।

हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि—
धारा 503 बीएनएसएस के अंतर्गत कार्यवाही केवल अंतरिम कस्टडी तक सीमित है।
इस चरण में नागरिक देयता या मुआवजा तय करना असंगत और अवैध है।
किसी गैर-पक्षकार, विशेषकर बीमा कंपनी को बिना सुने देयता थोपना प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है।
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने 1,70,819 रुपये की मुआवजा शर्त को निरस्त कर दिया।

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