नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (5 फरवरी) को जॉइंट हिंदू फैमिली की संपत्तियों से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया कि यदि पैतृक और आय देने वाली संपत्ति का अस्तित्व साबित हो जाता है, तो जॉइंट फैमिली के दौरान कर्ता द्वारा किया गया कोई भी बाद का अधिग्रहण सामान्यतः जॉइंट फैमिली की संपत्ति माना जाएगा। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति उसे अपनी निजी संपत्ति बताता है, तो उस पर यह साबित करने का ठोस सबूत देने का बोझ होगा।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा,
“जहां जॉइंट फैमिली के अस्तित्व के दौरान अधिग्रहण किए जाते हैं और आय देने वाली पैतृक संपत्तियों का अस्तित्व दिखाया जाता है, वहां कर्ता के नाम पर खरीदी गई संपत्तियों को सामान्यतः जॉइंट फैमिली की संपत्ति माना जाएगा, जब तक कि इसके विपरीत साबित न हो।”
दो भाइयों के बीच संपत्ति विवाद
यह मामला एक जॉइंट हिंदू फैमिली की संपत्तियों के बंटवारे को लेकर दो भाइयों के बीच चले लंबे विवाद से जुड़ा था। विवाद की शुरुआत वर्ष 1987 में हुई, जब दुरईसामी ने अपने पिता सेंगन और भाई दोरईराज के खिलाफ बंटवारे का मुकदमा दायर किया। मामला तिरुचिरापल्ली जिले के पेरम्बलूर तालुक की 79 अचल संपत्तियों से संबंधित था, जिनमें अधिकांश कृषि भूमि थी। वादी का दावा था कि ये सभी पैतृक संपत्ति और उससे होने वाली आय से अर्जित जॉइंट हिंदू फैमिली की संपत्तियां हैं।
अपीलकर्ता की दलील
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता दोरईराज ने तर्क दिया कि कई संपत्तियां या तो उनके पिता की निजी खरीदी थीं या फिर उन्होंने खुद ठेकेदारी और व्यवसाय से अर्जित आय से खरीदी थीं। उन्होंने पिता द्वारा उनके पक्ष में की गई सेल डीड और 24 नवंबर 1989 की एक अपंजीकृत वसीयत का भी हवाला दिया।
हाईकोर्ट के फैसले को मिली मंजूरी
ट्रायल कोर्ट ने वादी का दावा खारिज कर दिया था, लेकिन पहली अपीलीय अदालत और बाद में हाईकोर्ट ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए संयुक्त संपत्ति में 5/16 हिस्सा देने का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने कुछ संपत्तियों को छोड़कर बाकी सभी को जॉइंट फैमिली की संपत्ति माना।
सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष
हाईकोर्ट और पहली अपीलीय अदालत के फैसलों को बरकरार रखते हुए जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा द्वारा लिखे गए निर्णय में कहा गया कि एक बार आय देने वाली पैतृक संपत्ति का अस्तित्व सिद्ध हो जाए, तो बाद में खरीदी गई संपत्तियों को निजी साबित करने का बोझ दावे करने वाले पर ही आता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अलग-अलग उपयोग, सिंचाई सुविधाओं की स्थापना या व्यक्तिगत रूप से कर्ज लेना अपने आप में बंटवारे का प्रमाण नहीं होता।
कोर्ट ने कहा कि विभाजन के इरादे का स्पष्ट और निर्विवाद प्रमाण न होने पर संयुक्त परिवार की स्थिति बनी रहती है।
अपील खारिज
इन सभी तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और कहा कि हाईकोर्ट द्वारा दी गई सीमित राहत में दखल देने का कोई कारण नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल वही संपत्तियां अपीलकर्ता की निजी मानी जाएंगी, जिनके बारे में यह साबित हुआ कि वे तीसरे पक्षों से स्वतंत्र रूप से खरीदी गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पैतृक आय साबित होते ही कर्ता के नाम खरीदी संपत्ति मानी जाएगी जॉइंट फैमिली की


