बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि कोई महिला बिना किसी वैध और बाध्यकारी कारण के अपने पति और ससुराल वालों से अलग रहने का फैसला करती है, तो वह भरण-पोषण भत्ता पाने की हकदार नहीं होगी।
अदालत ने बिलासपुर परिवार न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी को मासिक भत्ता न देने का निर्देश दिया गया था। यह निर्णय वैवाहिक विवादों में नए कानूनी मानकों की ओर इशारा करता है, जहां न्याय का आधार अब केवल संबंध ही नहीं बल्कि पक्षों का आचरण भी होगा।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि यदि कोई महिला बिना किसी वैध और उचित कारण के अपने पति से अलग रहती है, तो वह भरण-पोषण की हकदार नहीं होगी। यह निर्णय बिलासपुर निवासी प्रवीण कुमार वेदुला की पत्नी द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिकाकर्ता की पत्नी ने परिवार न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया गया था।
पारिवारिक न्यायालय का आदेश बरकरार रखा गया
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की पीठ ने कहा कि पारिवारिक न्यायालय के आदेश का अवलोकन करने से यह स्पष्ट होता है कि इसमें कोई अवैधता या खामी नहीं है जिसके लिए इस न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो। न्यायालय ने आगे कहा कि पारिवारिक न्यायालय का निष्कर्ष सही था क्योंकि पति ने भी हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की थी और महिला अपने पति के घर लौटकर अपना वैवाहिक जीवन पुनः शुरू कर सकती थी। ऐसी स्थिति में वह भरण-पोषण का दावा करने की हकदार नहीं है।
महिला ने अपने पति और उसके परिवार पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाया था। उसने आरोप लगाया कि शादी के चार दिन बाद ही उससे एक कार और 10 लाख रुपये लाने को कहा गया और उसके साथ मारपीट की गई। महिला ने मौखिक दुर्व्यवहार और शारीरिक एवं मानसिक यातना का भी आरोप लगाया। इस संबंध में एक शिकायत भी दर्ज कराई गई थी। फैसला पति के पक्ष में सुनाया गया।
पारिवारिक न्यायालय के अनुसार, यह निर्णय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125(4) का उल्लंघन करता है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि पत्नी बिना किसी उचित कारण के अलग रहती है, तो वह भरण-पोषण की हकदार नहीं है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के निर्णय को कानूनी रूप से सही पाया। उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि इस मामले पर पुनर्विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसमें कोई अवैधता या त्रुटि नहीं है।


