पटना।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 372 के तहत पीड़ित को केवल सीमित परिस्थितियों में ही अपील का अधिकार प्राप्त है और वह “अपर्याप्त सजा” के आधार पर अपील दायर नहीं कर सकता। सजा बढ़ाने की मांग करने का वैधानिक अधिकार केवल राज्य सरकार के पास है, जो सीआरपीसी की धारा 377 के अंतर्गत निहित है।
न्यायमूर्ति आलोक कुमार पांडे की एकल पीठ ने पीड़ित द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए कहा कि धारा 372 के परंतुक के अनुसार पीड़ित केवल तीन स्थितियों में अपील कर सकता है—(i) आरोपी के बरी होने पर, (ii) कम गंभीर अपराध के लिए दोषसिद्धि होने पर, या (iii) अपर्याप्त मुआवजा दिए जाने पर। पीठ ने स्पष्ट किया कि सजा की पर्याप्तता को चुनौती देने का अधिकार पीड़ित को नहीं दिया गया है।
न्यायालय ने कहा कि जहां अपर्याप्त मुआवजे के मामले में पीड़ित को अपील का अवसर मिलता है, वहीं सजा को अपर्याप्त बताते हुए अपील करने का प्रावधान नहीं है। सजा बढ़ाने की मांग करने का अधिकार सीआरपीसी की धारा 377 के तहत विशेष रूप से राज्य सरकार में निहित है।
मामले की पृष्ठभूमि में पीओसीएसओ अधिनियम से संबंधित एक प्रकरण में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा के खिलाफ पीड़ित ने अपील दायर कर सजा बढ़ाने तथा अतिरिक्त दंडात्मक प्रावधान जोड़ने की मांग की थी। अपील की वैधता पर यह आपत्ति उठाई गई कि धारा 372 पीड़ित को इस आधार पर अपील की अनुमति नहीं देती।
धारा 372 और 377 की तुलना करते हुए न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों, जिनमें राष्ट्रीय महिला आयोग बनाम दिल्ली राज्य (2010) शामिल है, पर भरोसा जताया और दोहराया कि अपर्याप्त सजा के खिलाफ अपील का अधिकार केवल राज्य को है।
अंततः, उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि राज्य सरकार जहां धारा 377 के तहत सजा बढ़ाने के लिए अपील कर सकती है, वहीं पीड़ित धारा 372 के अंतर्गत अपर्याप्त सजा के आधार पर अपील नहीं कर सकता।

